26 सितंबर 2010

११. हर ओर जिया हरसाए रे : शंभु शरण "मंडल"

मेघ बजे घनघोर सखी
हर ओर जिया हरसाए रे
पहली-पहली बार पिया
ज्यों घूँघट-पट अलगाए रे

करधर के करतल धुन सुनके
ताल नदी करछाल करे
पनसोई लहरों पर नाचे
सुतल आस जगाए रे

हरियाई मुरझाई छाती
बूदों की पाती पढ़के
बुलबुल बाँचे बैठ रुबाई
कोयल कजरी गाए रे

बौछारों की डोर में बंधके
वर अंबर धरती गोरी
साखी में बादल बिजुली के
फेरे सात लगाए रे

घट-घट पनघट छलके जैसे
नैनन से मनुहार करे
बनपाती बन जाए घाती
देख मुझे बउराए रे

प्रेमपचीसी खेले झींसी
गालों से ढलके हलके
मन फूले वनफूल बदन
संतूर हुआ अब जाए रे
--
शंभु शरण "मंडल"
धनबाद (झारखंड)

13 टिप्‍पणियां:

  1. बुलबुल बाँचे बैठ रुबाई...
    बहुत सुन्दर और सरस नवगीत| बधाई हो

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  2. वर्षा ऋतु में अगर कोकिला कजरी गाएगी तो पावस और बसंत दोनों का आनंद आने लगेगा.


    कविगण की अब कोकिला ने तोडा है मान
    पावस में है कूकने लगी कजरी गान
    दादुर मोर पपीहे संग खूब जमेगी जोड़ी
    मेघ-मल्लहार कभी,तो कभी बिहाग संग तोड़ी.

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  3. हरियाई ,मुरझाई छाती बूदों का पाती पढ के। विरह की सवेदना को रेखांकित करती एक सुन्दर "मिलन गीत"

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  4. यदि पाठषाला में खुद को सुधारने की अनुमति हो तो इस गीत को आंषिक संषोधनों के साथ इसप्रकार पढ़कर अपना आषाीर्वाद देने की कृपा करें


    बरजोर जिया हरसाए रे

    मेघ बजे घनघोर सखी
    बरजोर जिया हरसाए रे,
    पहली पहली बार पिया
    ज्यो घूंघट पट अलगाए रे,

    करधर के करतल धुन सुनके
    ताल, नदी करछाल करे,
    पनसोई सी झूम गई जब
    झांझ हवा झनकाए रेे,

    हरियाई मुरझाई छाती
    बूदों की पाती पढ़के,
    बुलबुल बांचे बैठ रुबाई
    कोयल कजरी गाए रे,

    बौछारों की डोर में बंधके
    वर अंबर धरती गोरी,
    साखी में बादल बिजुली के
    फेरे सात लगाए रे,

    घट घट पनघट छलके जैसे
    नैनन से मनुहार करे,
    बनपाती बन जाए घाती
    देख मुझे बउराए रे,

    प्रेमपचीसी खेले झींसी
    गालों के गलियारों में ं,
    मन फूले वनफूल बदन
    संतूर हुआ अब जाए रे,

    “ांभु “ारण मंडल
    धनबाद, झारखंड

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  5. करधर के करतल धुन सुनके
    ताल नदी करछाल करे
    पनसोई लहरों पर नाचे
    सुतल आस जगाए रे

    हरियाई मुरझाई छाती
    बूदों की पाती पढ़के
    बुलबुल बाँचे बैठ रुबाई
    कोयल कजरी गाए रे
    sunder upmayen achchha nav geet
    badhai
    rachana

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  6. विमल कुमार हेड़ा।28 सितंबर 2010 को 8:18 am

    अति सुन्दर रचना, शंभू जी को बहुत बहुत बधाई,
    धन्यवाद।
    विमल कुमार हेड़ा।

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  7. हमने पहले भी इंगित किया है कि :
    वर्षा में कोयल तो मौन साध लेती है. वह तो बसंत ऋतु में ही कुहु कुहू कूकती है.

    सत्य से दूर न जाएँ तो उचित होगा.

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  8. षारदाजी न चाहते हुए आपसे असहमति प्रकट करने को विवष हू । कवि को कल्पना की स्वाधीनता होती है इससे तो आप भी सहमत होंगी। रही बात कोयल के कूकने की तो बरसाता में कोयल गाती है यह बात सोलहो आने सच है। बसंत में सभी कोयल सामान्य रूप से गाती है लेकिन बरसात में केवल वहीं गाती है जो आनंद विभोर होती है ंअगर आपको अभी विष्वास नहीं होतो पावस के समय देष के किसी वनांचल प्रदेष में जाकर कुछ समय के लिए प्रवास करें आपको वहां की कोयल ही आपको यह आभास करा देगी। वैसे मैने जो गीत लिखा उसे गाते हुए सुनकर लिखा है अगर अब भी आपको एतराज है तो है उसपर किसी का बस थोडे़ ही है। धन्यवाद।

    प्रतिक्रिया के लिए सभी सुधी जनों को साधुवाद।

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  9. एक मनभावन नवगीत के लिये आपको हार्दिक बधाई ।
    शशि पाधा

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  10. मंडल जी,
    क्षमा करें.
    मेरा नाम षारदा न हो कर शारदा है जी.
    आपने जो कहा है वह किसी विशेष परिस्थितियों में सम्भव हो सकता है.
    पर कविके अनुसार तो सामान्यता
    "पावस आवत देख कर कोयल साधि मौन,
    अब दादुर वक्ता भये हम को पूछत कौन"

    खैर जी,
    आपका नवगीत अति सुंदर और मन भावना है.

    घट-घट पनघट छलके जैसे
    नैनन से मनुहार करे
    बनपाती बन जाए घाती
    देख मुझे बउराए रे

    अति सुंदर.
    आपको बहुत बधाई.

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  11. श्री शंभू शरण मंडलजी सही मायने में कवि मना हैं और कवि तो कल्पनाशील एवं भावुक होते हैं, उन्हें किसी सीमा में बांधना नभचर को एक पिंजरे में बंद करने के सामान होगा। अतएव,शारदाजी प्लीज आप अपने ऐतराज को उनके ऊपर मत थोपें,उन्हें अपनी कल्पना की उड़ान भरने दें। और मंडलजी, वाह क्या बात है, दिनों दिन आपकी निखार तो अब कयामत ढाने लगी है। मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएं।
    श्याम सुन्दर सिंह

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