1 अक्तूबर 2010

१४. बरखा हौले-हौले आओ : डॉ.त्रिमोहन तरल

छत पर
टीन पुरानी, उसको
तड़-तड़ नहीं बजाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

मज़दूरन माँ
हाड़ तोड़कर
थोड़ा-बहुत कमा लाई है
रूखा-सूखा
खिला-पिला
मुन्नी को अभी सुला पाई है
ख़ुद जग लेगी
पर उसकी
गुड़िया को नहीं जगाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

गुड़िया का
बापू भी यों तो
ज़्यादा नहीं कमा पाता है
उसी पुरानी
छत से, बापू
के बापू तक का नाता है
टीन बदलवाकर
यादों से
रिश्ता मत तुड़वाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

बूँदा-बाँदी
में तो काफी
काम यहाँ चलते रहते हैं
निपट दिहाड़ी
मज़दूरों के
बच्चे भी पलते रहते हैं
तेज़ बरसकर
बेचारों का
काम नहीं रुकवाओ
बरखा! हौले-हौले आओ

उपवन में
धीरे-धीरे
आना भी तो आना होता है
कोमल कलियों
को हलके
हाथों से सहलाना होता है
जितना सहन
कर सकें कलियाँ
उतना प्यार लुटाओ
बरखा! हौले-हौले आओ
--
डॉ.त्रिमोहन तरल

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह... वाह... बहुत खूब. नवगीत को कोमल कान्त पदावली के साथ मर्मस्पर्शी ममत्व और वात्सल्य से संयुक्त कर आपने लोरी का स्पर्श दे दिया. साधुवाद. हर पद और हर पंक्ति में मौलिक उद्भावनाएँ हैं. सामान्यतः पारिस्थितिक वैषम्य नव गीत में खुरदरापन ला देता है किन्तु आपने स्निग्धता से लबालब नवगीत रचकर मन मोह लिया.

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  2. डा सुभाष राय1 अक्तूबर 2010 को 7:26 am

    डा त्रिमोहन तरल का यह गीत व्यक्तिगत रूप से इतनी बार उनकी आवाज में सुन चुका हूं कि यह एक समूची तस्वीर की तरह मेरे जेहन में अंकित है, एक ऐसी तस्वीर, जो किसी फ्रेम में कैद नहीं है, बल्कि अपने भीतर कई कई तस्वीरें छिपाती दिखाती चलती है, एक ऐसी तस्वीर जो जड़ नहीं है, चैतन्य है, गतिशील है. मैं जब यह गीत यहां पढ रहा हूं तो डा तरल के मधुर कंठ से सुन भी रहा हूं. और सुनते हुए भीग रहा हूं, एक गरीब की वेदना से व्याकुल भी हो रहा हूं एवं जीवन के लिये बूंद के अमृतत्व को महसूस भी कर रहा हूं. एक सुशब्दित, सुध्वनित गीत की प्रस्तुति के लिये पूर्णिमा जी को और रचना के लिये गीतकारण को बधाइयां.

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  3. एक एक “ाब्द में जीवन के यथार्थ को पिरोता हुआ इस कार्यषाला का यह सबसे बेहतरीन नवगीत है
    इसमें बेबाक रूप से निखरी हुई श्री त्रिमोहन तरलजी की तरलता कि अति सरलता से आत्मसात हो रही है
    सरस सुप्रवाह की यह अन्यतम रचना बड़ी खुषनसीबी से हमे प्राप्त हुई है। इसके लिए टीम नवगीत और इसके रचनाकार श्रीतरल जी अषेश बधाई के पात्र हैं।

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  4. उत्तम द्विवेदी1 अक्तूबर 2010 को 4:20 pm

    मनमुग्ध कर देने वाला नवगीत पढ़ने के बाद पुनः-पुनः पढ़ने की पिपाशा जागृत करता है। नवगीतकार को बहुत-बहुत बधाई व धन्यवाद!

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  5. थपकी देकर जैसे निंदिया के देश पहुंचा देना चाहती है आपकी रचना जहाँ सपनों के देश में पीड़ा भुला दी जाय क्या कहूँ आशावाद को प्रणाम ...मेरे पास तो शब्द ही नहीं टिप्पणी नहीं बस प्रणाम समझकर स्वीकार कीजिये .

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  6. डा.तरल जी के इस सहज,सरल और तरल प्रवाह युक्त सुन्दर नवगीत से पाठशाला में एक नई लहर पैदा हुई है ,जो इस नवगीत सृजन अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगी ।

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  7. कोमल मधुर नवगीत ने मन मोह लिया.

    "कोमल कलियों
    को हलके
    हाथों से सहलाना होता है
    जितना सहन
    कर सकें कलियाँ
    उतना प्यार लुटाओ
    बरखा!हौले-हौले आओ"
    बधाई

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  8. तरल जी के इस सुन्दर नवगीत को प्रस्तुत करने के लिए पूर्णिमा जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

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  9. मन को बहुत राहत मिली ये कविता पढ़ के. आभार आपका.
    सादर शार्दुला

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