12 अक्तूबर 2010

२५. अंतस में हूक उठे

टप्-टप्-टप् बूँद गिरे
अंतस में हूक उठे
मेघ बजे

आमों की बगिया मॆं
मस्ती बौराई है
बरसेंगे गरज-ग‌रज‌
सूचना यह आई है
मत बरसो, मत बरसो
कौन कहे

झरनों की हर-हर पर‌
रीझ-रीझ जाता मन‌
गुन-गुन करते हँसते
हरे-हरे वन-उपवन
सर-सर-सर चले पवन
विटप हिले

सावन की रातों में
सजना बिन घर सूना
दिवस ढोए काँधों पर‌
रातों का दुख दूना
मन के दीपक लगते
बुझे-बुझे
--
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
१२ - शिवम् सुंदरम् नगर, छिंदवाड़ा (म.प्र.)

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  2. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है। बधाई स्वीकारें।

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  3. सावन की रातों में
    सजना बिन घर सूना
    दिवस ढोए काँधों पर‌
    रातों का दुख दूना
    मन के दीपक लगते
    बुझे-बुझे
    वाह! अति मार्मिक कल्पना। एक भावपूर्ण नवगीत के लिये बधाई स्वीकार करें
    सादर,
    शशि पाधा

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  4. सुन्दर रचना , वास्तविक नव-गीत कहा जासकता है ।

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  5. नवगीत की पाठशाला क्रमांक दस में मेरे लिखे गीत पर बधाई देने वाले सभी प्रशंसकों को बहुत बहुत धन्यवाद| दशहरा दीवाली की शुभकामनायें|

    प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

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