18 अक्तूबर 2010

०१. क्वाँर की इस साँझ

ले रही है नाम
नूपुर-झाँझ
प्रीतम-मीत का!
गा रही है गीत
अब गोधूलि
सोनल प्रीत का!

क्वाँर की इस साँझ
साजन ने
न जाने कह दिया क्या
मधुर उसके कान में!

फिर रही सजनी पुलक
घर-आँगने
मोहिनी मुस्कान मन-भर
सज नए परिधान में!

छुअन को महका रहा है
सरस झोंका प्यार-सा
मधु-सीत का!
चल पड़ा है सिलसिला अब
हर नवेली रात में
नव-रीत का!
--
रावेंद्रकुमार रवि

8 टिप्‍पणियां:

  1. गीत बहुत ही मनोहारी है, शब्‍द चयन भी श्रेष्‍ठ है। लेकिन मैं यहाँ इस गीत की विवेचना की बात कर रही हूँ जिससे हमें नवगीत की सार्थकता के बारे में ज्ञात हो सके। क्‍योंकि यह आदर्श गीत है इसलिए इसकी विवेचना होनी ही चाहिए।

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  2. सुन्दर नवगीत से कार्यशाला की शुरुआत करने के लिए रवीन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई।

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  3. अति सुन्दर प्रस्तुति . धन्यवाद

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  4. अति सुन्दर प्रस्तुति रावेंद्रकुमार रवि जी बहुत बहुत बधाई।
    सार्थक नवगीत के लिए
    शंभु शरण "मंडल"

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  5. नवगीत में मन की महक परिलक्षित हो रही है!
    --
    कार्यशाला का शुभारम्भ रवि जी के सुन्दर नदगीत से किया गया है!

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  6. नव गीत अपनी भाषिक शुद्धता, प्रवाह, बिम्बादी की दृष्टि पर खरा है किन्तु देशज टटकापन पूरी तरह अनुपस्थित है.
    छुअन को महका रहा है
    सरस झोंका प्यार-सा
    मधु-सीत का!
    यहाँ ''मधु-सीत का'' आशय पूरी तरह समझ नहीं सका. कृपया, समझा दें तो अधिक आनंद ले सकूंगा.

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  7. प्रिय गीता जी
    इतनी सुंदर रचना के लिए बधाई | कविता के दूसरे बंध में बंजर होंगे के स्थान पर हुए होना चाहिए | कृपया विचार करिएगा |
    शुभकामनाओं के साथ

    अशोक
    ashoks@bhel.in

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