28 अक्तूबर 2010

०६. महका मन

बहुत दिन के बाद
महका मन

सिलबटें कम की समय ने
एक ठंडक पी
लहलहाने लगा उर का
विपिन दंडक भी
मुदित चिड़ियों-सा
प्रकृति के साथ
चहका मन

मिल गई पर्यावरण को
शुद्ध आक्सीजन
इस तरह से कुछ हुआ
ॠतु-चक्र परिवर्तन
डूबकर स्वप्निल
सुरा-सरि आज
बहका मन
--
पं. गिरिमोहन गुरु

4 टिप्‍पणियां:

  1. गुरु जी!
    सादर नमन.

    सिलबटें कम की समय ने
    एक ठंडक पी
    लहलहाने लगा उर का
    विपिन दंडक भी
    मुदित चिड़ियों-सा
    प्रकृति के साथ
    चहका मन

    बहुत खूब. विपिन दंडक में ठंडक के दिन आरहे हैं और आपने अग्रिम ही उसका स्वागत कर दिया. साधुवाद. आपका नवगीत उअत्तम न होगा तो किसका होगा.

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  2. सिलबटें कम की समय ने
    एक ठंडक पी
    लहलहाने लगा उर का
    विपिन दंडक भी
    मुदित चिड़ियों-सा
    प्रकृति के साथ
    चहका मन
    bahut sunder
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. मिल गई पर्यावरण को
    शुद्ध आक्सीजन
    इस तरह से कुछ हुआ
    ॠतु-चक्र परिवर्तन
    डूबकर स्वप्निल
    सुरा-सरि आज
    बहका मन
    --
    पं. गिरिमोहन गुरु जी बहुत खूब.हार्दिक स्वागत और बधाई

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