30 अक्तूबर 2010

०७. महक उठें मन

चलो ढूँढ वो लाएँ चंदन
जिससे महक उठें मन

कब थे ऐसे फटे-हाल मन
अंतर्मन थे उपवन
पल-पल की ये भाग-दौड़ ही
रही भुलाए बचपन
मन के बिन कब पुष्प खिलेंगे
बंजर होंगे तन-मन
चलो ले आएँ वो स्पंदन
जिससे चहक उठें मन


प्रीत के बिरवे बोकर मन की
फसलें स्वयं उगानी
सूखे मन में नेह-नीर भर
कविता कोइ जगानी
मौन अधर रख आएँ बंसी
हर मन कहे कहानी
चलो ले आएँ वो अपनापन
जससे महक उठें मन


हम हैं बूँदें एक सिंधु की
पलक झपकते मिटतीं
हैं अनमोल खजाने मन क्यूँ
श्वास अटकते दिखतीं
खिले पंक में भी पंकज मन
यही सीख अपनानी
चलो ले आएँ नेह बंधन
जिससे बहक उठें मन
--
गीता पंडित

9 टिप्‍पणियां:

  1. प्रीत के बिरवे बोकर मन की
    फसलें स्वयं उगानी
    सूखे मन में नेह-नीर भर
    कविता कोइ जगानी
    मौन अधर रख आएँ बंसी
    हर मन कहे कहानी
    चलो ले आएँ वो अपनापन
    जससे महक उठें मन
    bahut pyari abhivyakti
    badhai
    rachana

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  2. Navgeet ki Pathshala mein geeton ki shabnami tazgi ati lubhawani hai..
    Geeta Pandit ko is sunder aagaz ke liye shubhkamnayein
    चलो ढूँढ वो लाएँ चंदन
    जिससे महक उठें मन

    Aaj ke Vidushit mahaul mein iski zaroorat hai. Prenatmak pantion ke liye sadhuwaad
    Devi nangrani

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रीत के बिरवे बोकर मन की
    फसलें स्वयं उगानी
    सूखे मन में नेह-नीर भर
    कविता कोइ जगानी
    मौन अधर रख आएँ बंसी
    हर मन कहे कहानी
    चलो ले आएँ वो अपनापन
    जससे महक उठें मन
    हार्दिक स्वागत गीता जी, अति सुंदर रचना

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  4. सरस-सहज मन को छूती गीति रचना हेतु बधाई.

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  5. धर्मेन्द्र जी,
    सलिल जी
    मंडलदास जी....आभार..


    शुभ कामनाएँ....

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  6. @ mandalass

    मंडलदास लिखने केलियें क्षमा प्रार्थी हूँ...

    आभार...

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  7. @ देवी

    आपके उत्साहवर्धन के लियें आभारी हूँ..


    रचना जी भाटिया जी...आभार आपका...

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