6 फ़रवरी 2011

८. मेरे दर पे सड़क

ट्रैफ़िक भरी
मेरे दर पे सड़क
घर है सड़क पे
कि घर पे सड़क

ज़ोरों का बाजा
हुल्लड़ नाच शादी
उत्सव जनम का
मरन की मुनादी
बरसे हैं सब
याने सर पे सड़क

बैठक में करती
ट्रैफ़िक जाम अक्सर
गर्दो धुआँ हॉर्न
कोहराम अक्सर
उसकी है
सोफ़ा कव्हर पे सड़क

छोटा झरोखा
नहानी में घुसकर
ठंडा करे क्या
जुलूस और बैनर
साबुन पे मै हूँ
शावर पे सड़क

अनचीन्हे मुख
बेतकल्लुफ़-सी बातें
ज़िन्दा करे ये
मरे रिश्ते नाते
चढ़ती है
लंच और डिनर पे सड़क ।


अनिरुद्ध नीरव

4 टिप्‍पणियां:

  1. घर है सड़क पे
    कि घर पे सड़क


    सही कहा आपने...और सुंदर भी...

    आभार अनिरुद्ध जी...

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  2. सडक की गहमागहमी
    घर तो एकांत पे बनाया था. पर सडक निकल चली
    "घर है सड़क पे कि घर पे सड़क"
    very nice.

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  3. KYA khoob likha hai sadak pr ghr ya ghr pe sadak
    badhai
    rachana

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  4. मुझको यह रचना रुची. अच्छी रचना पर काम टिप्पणियाँ...?

    उत्तर देंहटाएं

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