8 फ़रवरी 2011

९. सड़क पर

कहीं है जमूरा,
कहीं है मदारी.
नचते-नचाते
मनुज ही सड़क पर...
*
जो पिंजरे में कैदी
वो किस्मत बताता.
नसीबों के मारे को
सपना दिखाता.
जो बनता है दाता
वही है भिखारी.
लुटते-लुटाते
मनुज ही सड़क पर...
*
साँसों की भट्टी में
आसों का ईंधन.
प्यासों की रसों को
खींचे तन-इंजन.
न मंजिल, न रहें,
न चाहें, न वाहें.
खटते-खटाते
मनुज ही सड़क पर...
*
चूल्हा न दाना,
मुखारी न खाना.
दर्दों की पूंजी,
दुखों का बयाना.
सड़क आबो-दाना,
सड़क मालखाना.
सपने-सजाते
मनुज ही सड़क पर...
*
कुटी की चिरौरी
महल कर रहे हैं.
उगाते हैं वे
ये फसल चर रहे हैं.
वे बे-घर, ये बा-घर,
ये मालिक वो चाकर.
ठगते-ठगाते
मनुज ही सड़क पर...
*
जो पंडा, वो झंडा.
जो बाकी वो डंडा.
हुई प्याज मंहगी
औ' सस्ता है अंडा.
नहीं खौलता खून
पानी है ठंडा.
पिटते-पिटाते
मनुज ही सड़क पर...

--संजीव सलिल

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब!सत्य कहा सलिल जी!
    वह बेचारा,
    परालब्ध का मारा!!

    "मनुज ही सड़क पर"

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  2. सलिल साहब,
    बहुत ही सटीक रचना है... भाव एवं अर्थ से परिपूर्ण... सामयिक भी है और शब्द चुनाव अत्यन्त अनुभवी-व्यवहारिक हैं...

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  3. वाह वाह वाह, क्या बात है। शानदार नवगीत के लिए आचार्य जी को बधाई।

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  4. लुटते-लुटाते
    मनुज ही सड़क पर...

    सही कहा है सलिल जी| नमन|

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  5. कुटी की चिरौरी
    महल कर रहे हैं.
    उगाते हैं वे
    ये फसल चर रहे हैं.
    वे बे-घर, ये बा-घर,
    ये मालिक वो चाकर.
    ठगते-ठगाते
    bahut sunder
    badhai
    saader
    rachana

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  6. गुणग्राहकता हेतु धन्यवाद...
    समर्पित कुछ पंक्तियाँ...

    सज्जन सड़क पर,
    हैं नीरज सड़क पर
    मिली शारदा जी
    सड़क पर भटककर
    सड़क जाम ना हो
    ये बदनाम ना हो
    आगे को बढ़िये
    न रहिये अटककर

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