2 अप्रैल 2011

२. अब तक का यह समाचार है


अब तक
का यह समाचार है
आने वाला कल उधार है

ख़त्म
हो गई संचित पूँजी
घर में बाकी भाँग न भूँजी
पापा को कह कर के मूज़ी
लड़का बाइक पर
सवार है

बेटी
बड़ी हो गई कैसे
लिप्टस के बिरवा की जैसे
रहे जोड़ते पैसे - पैसे
लाखों में वर की
पुकार है

जीवन
में आ गई सुनामी
जकड़ गई है नई ग़ुलामी
घर के ज़ेवर की नीलामी
करता, टीवी का
प्रचार है

चौराहे
पर चर्चा है जी
किसका कितना खर्चा है जी
सबने बाँटा पर्चा है जी
लोकतंत्र का
चमत्कार है

सब
अपने में व्यस्त हुये हैं
किसी नशे में मस्त हुये हैं
सत्ता के विश्वस्त हुये हैं
सूनी वीरों की
मज़ार है

-अमित
( इलाहाबाद )

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह क्या बात है
    बहुत बहुत सुन्दर

    चौराहे पर चर्चा है जी ..... वाह क्या बात है अमित जी

    इलाहाबादी तो मैं भी हूँ आप कहाँ रहते हैं ?
    संपर्क करे
    venuskesari@gmail.com

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  2. क्या कहने - इसमें "बहुत खूब" कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा लगता है :-)

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  3. अच्छा नवगीत किंतु जरा सा सुधारने की जरूरत है। छन्द ठीक है भाषा भाव और लय समीचीन है। अमित को बधाई।

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  4. एक बहुत ही सुन्दर गीत के लिए बधाई| हर अंतरा कमाल का है| लगता है नवगीतकारों की एक मुलाकात इलाहाबाद मे होनी ही चाहिए| वीनस जी ज़रा इंतज़ाम कीजिये हम भी तैयार हैं|

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  5. अमित जी !

    आपको पढ़ना अच्छा लगा...
    आभार ...

    सुंदर नवगीत के लियें
    आपको बधाई...

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  6. अमित का यह नवगीत एक अच्छा नवगीत है। भावपक्ष में थोड़ी कसावट और हो सके तो फिर क्या कहने। भविष्य में और अच्छे नवगीत की अपेक्षा के साथ इस नवगीत के लिए वधाई।

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  7. लिप्टस के बिरवा के जैसे
    सुन्दर तुलना
    अच्छा नव गीत
    बधाई
    रचना

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  8. कई कार्यशालाओं के बाद अमित जी का नवगीत पढ़ने को मिला। इतना शानदार और जानदार नवगीत लिखने के लिए अमित जी को बहुत बहुत बधाई। राणा भाई और वीनस जी जब भी इलाहाबाद में ऐसा कोई कार्यक्रम बने तो बताइएगा हो सकता है मैं भी उपलब्ध रहूँ।

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  9. लाखों में वर की पुकार है - वाह, क्या भाव हैं । अमित जी ऐसे ही लिखते रहिए । बधाई । - ओमप्रकाश तिवारी

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  10. बहुत खूब...इस रचना की विशेषता यह लगी कि समाचार का बहुआयामी विश्लेषण-सा हो गया है- पहले अंतर में बेटा फिर बेटी. जीवन, चौराहा, और अंत में सब...। सबसे संबंधित एक शब्द को अंतरे का पहला शब्द बनाया गया है। बड़े संभाल कर लिखी गई रचना... पहले अंतरे में भी ख़त्म की जगह बेटा शब्द आ जाता तो कमाल हो जाता... फिर भी रचना पसंद आई।

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  11. पापा को कह कर के मूजी
    लड़का बाइक पर सवार है

    घर के जेवर की नीलामी [जब घर में पड़ा है सोना]

    सुनी वीरों की मज़ार है

    बहुत बहुत बहुत ही बढ़िया नवगीत अमित भाई| बधाई|
    http://samasyapoorti.blogspot.com

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  12. @सुरुचि जी, आपकी सुरुचि की प्रशंसा करूँगा। लड़का के स्थान पर बेटा बेहतर शब्द होगा इसे बाद में मैंने भी सोचा। आपका भी अभिमत मिल गया अतः मूल रचना में इसे बदल दिया है। अन्य सुधी जनों के सुझाव भी शिरोधार्य हैं। सादर

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  13. अमित जी अगर सुधारों की बात करें तो "पुत्र हो गया संचित पूँजी" और "लिप्टस की बिरवा हो जैसे" और "जोड़ रहे हम पैसे पैसे" किया जा सकता है पर आप ने पहले ही कर लिया होगा ऐसा मेरा विश्वास है।

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  14. धर्मेंन्द्र जी,
    रचना को ध्यान से पढने के लिये एवं सुझाव के लिये धन्यवाद! मेरी समझ से पहला सुझाव मेरे कथ्य से मेंल नहीं खाता, ’लिप्टस की बिरवा’ में लिंग साम्य नहीं बन पा रहा है और अन्तिम ’जोड़ रहे हैं पैसे पैसे’ में ’हैं’ के साथ ’हम’ अन्तर्निहित (implied) है। पुनः धन्यवाद! इस बार मैं इन सुझावों को प्रयोग नहीं कर पाया परन्तु में भविष्य में भी आपसे सुझावों की अपेक्षा बनी रहेगी।
    सादर

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