23 अप्रैल 2011

२३. खोल देते पिटारे

खोल देते पिटारे
अपठनीय होते
पठनीय हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

दुनियाँ की दौड़-धूप में
उलझे-उलझे सुलझे
गाँव महानगरों में सिमटे
खोल देते पिटारे
मौन के स्वर हैं
गूँजते हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

हैं सम्बन्धों के शत्रु-मित्र
शंकाओं के बीज, और
दौड़ते रहते अहर्निश
युगों से कितने समर्पित-
गगन से झाँकते
सूर्य के हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

मुखौटे झूठे-सच्चे
चेहरा दिखाते, दर्पण हैं
दुनिया को मुट्ठी में रखते
बड़े विचित्र, बड़े विशाल -
पकड़ में न आते
अपरिचित हस्ताक्षर जैसे
ये समाचार।

- निर्मला जोशी
(भोपाल)

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति से परिपूर्ण कविता के लिए बधाई निर्मला जी.

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  2. सुंदर रचना है मगर गीत जैसा प्रवाह नहीं है। निर्मला जी को बधाई

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  3. अति उत्तम ,अति सुन्दर और ज्ञान वर्धक है आपका ब्लाग
    बस कमी यही रह गई की आप का ब्लॉग पे मैं पहले क्यों नहीं आया अपने बहुत सार्धक पोस्ट की है इस के लिए अप्प धन्यवाद् के अधिकारी है
    और ह़ा आपसे अनुरोध है की कभी हमारे जेसे ब्लागेर को भी अपने मतों और अपने विचारो से अवगत करवाए और आप मेरे ब्लाग के लिए अपना कीमती वक़त निकले
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  4. निर्मला जोशी जी का गीत पाठशाला में बहुत दिनों के बाद देखने को मिला। कुछ नई प्रयोगवादी शैली के साथ। अच्छा लगा। स्वागत...

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  5. मुखौटे झूठे-सच्चे
    चेहरा दिखाते, दर्पण हैं
    दुनिया को मुट्ठी में रखते
    बड़े विचित्र, बड़े विशाल -
    पकड़ में न आते
    अपरिचित हस्ताक्षर जैसे
    ये समाचार।
    सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. नवगीत पाठशाला १५
    नवगीत पाठशाला १५ में मेरी रचना को सुरुचि संपन्न सुधी पाठकों ने अपने अभिमतो द्वारा जो संबल दिया उसके लिए हार्दिक
    आभार ! और आभार है अभिव्यक्ति अनुभूति परिवार का जो मुझे निरन्तर नई दिशा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता रहता है !
    मेरा विश्वास लिखते रहने में है निर्णायक तो मेरे सुधी पाठक और मार्ग दर्शक हैं!
    शुभ कामनाओं साहित--
    निर्मला जोशी

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