10 जून 2011

८. जब होंगे फिर मन पलाश

जब होंगे फिर मन पलाश

भटक गए हैं
कालखण्ड में
रंग वसंती, केसू, केसर
आसक्ति का
नेह में तिरना
सुन्दरि का अन्तः निवास।

अपरिमेय
आनन्दिक अनुभव
संग - सहेली
स्मृति खोई
कब बोलेंगे ‘पिउ’ ‘पिउ’
बिखरेगी चहुँदिश सुवास।

रूप केतकी
ढीठ निगोड़ी
इठलाएगी छलना जैसी
रीझ उठेंगे
अनजाने ही
विस्मृत कर अपने संत्रास।

चंचल नदी
लहरता आँचल
अविरल कल-कल
मय निश्छल जल
लौटेंगे वे बीते दिन
जब होंगे फिर मन पलाश।

-हरीश प्रकाश गुप्त

6 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण नवगीत की प्रस्तुति के लिए साधुवाद!
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    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
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  2. हरीश प्रकाश गुप्त जी की कविता "जब होंगे फिर मन पलाश" एक अच्छी कविता है. यदि इसमें थोड़ा प्रवाह और लय का निर्वाह हो सके तो यह एक अच्छा नवगीत भी बन सकता है। नवगीत में लय और प्रवाह का विशेष ध्यान तो रखना ही होगा साथ ही नये प्रतीक, नये बिम्ब एवं लोक की छुअन के साथ सरल और सहज भाषा नवगीत को लोकप्रिय बनाने में अहं भूमिका का निर्वहन करती है। दरअसल जब एक अच्छा नवगीत बन जाता है तो उसे बार बार गुनगुनाने का मन होता है और यही नवगीत की कसौटी भी है, नवगीतकार को उसका नवगीत जब सम्मोहित करने लगे तो समझो कि सफल नवगीत की रचना हो गई है।

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  3. सुंदर रचना है, व्योम जी के विचारों से सहमत हूँ।

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  4. नये प्रतीक, नये बिम्ब
    प्रवाह, लय,
    भेद अति अदम्य,
    यह गीत हो या नवगीत!
    अति सुंदर सुरम्य!

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  5. चंचल नदी
    लहरता आँचल
    अविरल कल-कल
    मय निश्छल जल
    लौटेंगे वे बीते दिन
    जब होंगे फिर मन पलाश।

    बहुत सुंदर गीत .सुंदर शब्दों से सजा जैसे पलाश से सजा मौसम

    रचना

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