18 अक्तूबर 2011

२१. ऊँचे ऊँचे टँगे कंदील

खुशियों से आँगन भरने को,
छोटे छोटे दीप सजे,
ऊँचे ऊँचे टँगे कंदील।

द्वार सजाएँ बंदनवार
चमके घर-आँगन
चम-चम
माँ लक्ष्मी के पाँव सजाएँ
कुल्हिया भरे बताशे खील

आसमान से लिपटे आतिश
तारे आए
धरणी पर
दीवाली की धूम में देखो
जागी गाँव की सोई झील

नव परिधानों में सब निकले,
सजी रंगोली
अंतस महके
खुशियों से आँगन भरने को
नियमों ने कुछ बरती ढील

-भावना सक्सेना
(पारामारीबो, सूरीनाम)

13 टिप्‍पणियां:

  1. खुशियों से आँगन भरने को
    नियमों ने कुछ बरती ढील
    सुन्दर!

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  2. .....
    तारे आए
    धरणी पर
    दीवाली की धूम में देखो
    जागी गाँव की सोई झील

    बहुत सुंदर पंक्तियां ग्रामीण परिवेश और दीपावली
    के मनोहर दृश्य का अद्भुत संगम - बधाई भावना जी

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  3. kripaya devnagree me likhna sikhaayen ,mujhe mail devnagree me likhna aata hai ! yahan naheen likh saktee !
    bhavna jee ke kheel ,batashon se man meetha bhee ho gaya ! or desh bhee ghoom aaya !

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. भावना जी आपको हार्दिक बधाई...

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  6. भावना जी आपको हार्दिक बधाई.....

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  7. भावना जी आपको हार्दिक बधाई ....

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  8. भावना जी बहुत सुन्दर रचना है बधाई......

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  9. नियमों ने कुछ बरती ढील ...वाह सुंदर कल्पना भावनाजी

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  10. ..."द्वार सजाएँ बंदनवार
    चमके घर-आँगन
    चम-चम"

    बहुत सुंदर.

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  11. भावना जी!
    'कुल्हिया भरे बताशे खील' ने बचपन को फिर जीने का अवसर दिया.
    'खुशियों से आँगन भरने को
    नियमों ने कुछ बरती ढील'

    इस ढील बरतने ने ही तो आज की परिस्थिति पैदा की है...

    सार्थक रचना, बधाई.

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  12. अनुपमा जी, श्रीकांत जी, रेखा जी, प्रीति जी, अरोमा जी, संध्या जी, धर्मेंद्र जी, संजीव जी मुझे खुशी है आपको यह गीत पसंद आया। उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार।

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