2 दिसंबर 2011

२. नूतन वर्ष तुम्हारा स्वागत

विगत विलीन,उदित है आगत
नूतन वर्ष,तुम्हारा स्वागत

मन बंजारा भटक रहा था
खोने का गम लिए निरंतर
जीवन मूल्य नए पाने को
ढूँढ रहा था नए जालघर
कोहरा छँटा सामने पाया
नवल रूप सृष्टि का प्राकृत

दुश्चक्रों से घिरे वक्त का
कुटिल रूप अब धुंधलाया
सदमित्रों की एक नई
सौगात नया मौसम लाया
स्नेहसिक्त रिश्तों की गरिमा
सहेजने को मन है उद्यत

एकाकीपन हुआ पुरातन
नई सहर सूरज के साथ
जिसने हाथ बढाया आगे
वही मित्र अपना है आज
शांत ज्वार भाटा जीवन का
फिर जिजीविषा हुई है जाग्रत

- कल्पना रामानी
मुंबई से

6 टिप्‍पणियां:

  1. मन बंजारा भटक रहा था
    खोने का गम लिए निरंतर
    जीवन मूल्य नए पाने को
    ढूँढ रहा था नए जालघर
    कोहरा छँटा सामने पाया
    नवल रूप सृष्टि का प्राकृत

    बढ़िया नवगीत

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  2. पूरी कविता में शब्द संयोजन और उसमें भावों का अवगुंठन इतना सशक्त और मौलिक लगा कि आनंद आ गया.

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  3. पूरी कविता में शब्द संयोजन और उसमें भावों का अवगुंठन इतना सशक्त और मौलिक लगा कि आनंद आ गया.

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  4. कल्पना रमणी जी ,,स्वागत अप तो हमारे पडोसी निकले,,, नववर्ष को बड़ी खूबसूरती से शब्दबद्ध किया बधाई,,,..

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