समय की पगडंडियों पर
चल रहा हूँ मैं निरंतर
कभी दाएँ , कभी बाएँ,
कभी ऊपर , कभी नींचे
वक्र पथ कठिनाइयों को
झेलता हूँ आँख मींचे
कभी आ जाता अचानक
सामने अनजान सा डर
साँझ का मोहक इशारा
स्वप्न-महलों में बुलाता
जब उषा नवगीत गाती
चौंक कर मैं जाग जाता
और सहसा निकल आते
चाहतों के फिर नये पर
याद की तिर्यक गली में
कहीं खो जाता पुरातन
विहँस कर होता उपस्थित
बाँह फैलाये नयापन
रूपसी प्राची रिझाती
विविध रूपों में सँवर कर
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
आबू रोड से
चल रहा हूँ मैं निरंतर
कभी दाएँ , कभी बाएँ,
कभी ऊपर , कभी नींचे
वक्र पथ कठिनाइयों को
झेलता हूँ आँख मींचे
कभी आ जाता अचानक
सामने अनजान सा डर
साँझ का मोहक इशारा
स्वप्न-महलों में बुलाता
जब उषा नवगीत गाती
चौंक कर मैं जाग जाता
और सहसा निकल आते
चाहतों के फिर नये पर
याद की तिर्यक गली में
कहीं खो जाता पुरातन
विहँस कर होता उपस्थित
बाँह फैलाये नयापन
रूपसी प्राची रिझाती
विविध रूपों में सँवर कर
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
आबू रोड से
बहुत ही सुंदर नवगीत है ये ठकुरेला जी का, बहुत बहुत धन्यवाद इसे प्रस्तुत करने के लिए
जवाब देंहटाएंकभी दाएँ , कभी बाएँ,
जवाब देंहटाएंकभी ऊपर , कभी नींचे
वक्र पथ कठिनाइयों को
झेलता हूँ आँख मींचे
कभी आ जाता अचानक
सामने अनजान सा डर
सम्पूर्ण रचना ही प्रभावित करती है