23 दिसंबर 2011

२३. आ गया नव वर्ष फिर,

आ गया नव वर्ष फिर,
शुभ कामना शुभ कामना
है सरल कितना
तुम्हारी देह भाषा बाँचना

अंत: करण में छत्र
जितना भी छलावा लिख रहे
आज तो स्पष्ट सारे
शब्द उसके दिख रहे
श्वेत वस्त्रों की तलहटी
में छुपी है धूर्तता
हर फटे में झाँकती
दिखती तुम्हारी मूर्खता
अब नहीं होगा असंभव
मन तुम्हारा भाँपना

आज तक तो आपनें
बंदर नचाये हैं
और उनकी ओट में
बंगले बनाये हैं
अब समय है आपको
बंदर नचाएँगे
हाँककर दौड़ाएँगे
मारें भगाएँगे
वन प्रांतरों में आपको
करनी पड़ेगी साधना

बेशरम की पौध से
अब भी खड़े हो तीर पर
बगुले भगत क्यों द्दष्टि अब तक
मछलियों पर नीर पर?
आलोचनाओं से तुम्हें अब
डर कहीं लगता नहीं
तूफान कितना तेज है
पर क्यों तुम्हें दिखता नहीं?
छोड़कर घर द्वार तुमको
अब पड़ेगा भागना

हर दिवस नव पल्लवों का
द्रुम‌ विटप पर राज होगा
धूल में जो कल पड़ा था
आज वह सरताज होगा
नाव में अब तक रखीं
जाती रहीं थीं गाड़ियाँ
किंतु गाड़ी में रखेंगे नाव
हैं तैयारियाँ
आ गया नव वर्ष फिर,
शुभ कामना शुभ कामना
प्रभुदयाल
-छिंदवाड़ा से

3 टिप्‍पणियां:

  1. साधुवाद भाई प्रभुदयाल जी को| उनका यह गीत लंबी बहर का होते हुए भी नवगीत की कहन को काफी हद तक पकड़ता है| अंतिम पद तो बहुत ही अच्छा बन पड़ा है|

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  2. इस शृंखला में एक से एक नवगीत बहुत ही सुन्दर बन पड़े हैं । अब इस नवगीत को ही ले लीजिये। कितनी सुन्दरता से आज के माहोल को बाँध लिया है? आपकी काव्य-शक्ति को नमन !

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