21 जनवरी 2012

७. शीत से कँपती धरा

शीत से कँपती धरा की
ओढ़नी है धूप
कोहरे में छिप न पाये
सूर्य का शुभ रूप

सियासत की आँधियों में उड़ाएँ सच की पतंग
बाँध जोता और माँझा, हवाओं से छेड़ जंग
उत्तरायण की अँगीठी में बढ़े फिर ताप-
आस आँगन का बदल रवि-रश्मियाँ दें रंग
स्वार्थ-कचरा फटक-फेंके
कोशिशों का सूप

मुँडेरे श्रम-काग बैठे सफलता को टेर
न्याय-गृह में देर कर पाये न अब अंधेर
लोक पर हावी नहीं हो सेवकों का तंत्र-
रजक-लांछित सिया वन जाए न अबकी बेर
झोपड़ी में तम न हो
ना रौशनी में भूप

पड़ोसी दिखला न पाए अब कभी भी आँख
शौर्य बाली- स्वार्थ रावण दबाले निज काँख
क्रौच को कोई न शर अब कभी पाये वेध-
आसमां को नाप ले नव हौसलों का पांख
समेटे बाधाएँ अपनी
कोख में अब कूप


-आचार्य संजीव सलिल

14 टिप्‍पणियां:

  1. इस सुंदर नवगीत के लिए आचार्य जी को बहुत बहुत बधाई

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    1. सज्जन करें सराहना, है सचमुच सौभाग्य.
      करें प्रशंसा असज्जन, तो ले लो वैराग्य..

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  2. तथास्तु.
    आशावादी नवगीत.सुदर.

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    1. आशा पर
      आसमान टाँगकर.
      ले आयें गीत नए
      शारदा से माँगकर.
      गुनगुनाएं-गायेंगे
      उत्सव मनाएंगे..

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  3. परमेश्वर फुँकवाल21 जनवरी 2012 को 4:45 pm

    बहुत सुन्दर शुभकामनाएँ हैं आ. संजीव जी.

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    1. परमेश्वर हैं साथ
      चित मत हो अब चंचल.
      मौन न हो, रच गीत नव
      दे बिखेर परिमल..

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  4. सुंदर नवगीत के लिए आचार्य जी को बहुत बहुत बधाई

    Prabhudayal

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    1. प्रभु दयालु हैं जानकर
      अर्पित करता गीत.
      वह तंदुल स्वीकार कर
      'सलिल' निभाता प्रीत..

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  5. सुन्दर रचना !

    अवनीश तिवारी

    मुम्बई

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    1. सलिल न कलकल बह सके
      मिले न गर अवनीश.
      लहर-लहर नित गीत गा-
      कहे अमर वागीश..

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  6. विमल कुमार हेड़ा।23 जनवरी 2012 को 7:35 am

    शीत से कँपती धरा की ओढ़नी है धूप
    कोहरे में छिप न पाये सूर्य का शुभ रूप
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ अच्छे नवगीत के लिये आचार्य संजीव जी को बहुत बहुत बधाई।
    धन्यवाद।
    विमल कुमार हेड़ा।

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    1. सलिल विमल हो तभी दिखता सच का रूप.
      कर देती है मलिनता, सारे रूप अरूप..

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  7. उत्तर
    1. किरण मोहिनी जगाती, नव आशा-प्रतिमान.
      'सलिल' धार में उतरते , हर्षित हो दिनमान..

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