23 जनवरी 2012

९. सूरज के ढाबे पर

सूरज के ढाबे पर फिर से
दहकी है तंदूरी आग
मौसम आज परोसे मक्के
की रोटी सरसों का साग

इसका सादापन
प्यारे पकवानों पर भारी
मिट्टी सी है इसकी खुशबू, गुड़ से है यारी
जीभ हलों की इसको खाकर और तेज होती
बर्फीले खेतों को मक्खन-सा करके बोती
इसीलिए शायद मक्खन का
दिल से इसके अनुराग

रोज काल से
पेंच लड़ाकर ये जीता करता
धूप में माँझा तन का मंझा मुश्किल से कटता
मन-पतंग ने बाँध लिया है माटी से बंधन
बोझ हटा कल की लालच का छूती नील गगन
महक रहे हैं इसी स्वाद से गाँव,
खेत, घर, आँगन, बाग

धीरे धीरे सर्दी जाएगी गर्मी आएगी
बर्गर की कैलोरी तन में जमती ही जाएगी
कितने दिन तक मानव ऐसे कूड़ा खाएगा
इक दिन सूरज मॉलों में भी ढाबा खुलवाएगा
उस दिन जाड़ा खुद ले लगा
इस दुनिया से चिर बैराग

धर्मेन्द्र कुमार सिंह सज्जन

14 टिप्‍पणियां:

  1. धर्मेंद्र जी, बहुत बढ़िया. सोच, भाव, उपमा सब बहुत सुंदर है. बधाई

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  2. परमेश्वर फुँकवाल23 जनवरी 2012 को 7:26 pm

    कड़ाके की सर्दी में इस ढाबे पर कुछ हो जाये. वाह धर्मेन्द्र जी बहुत सुन्दर...बधाई.

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  3. सुंदर नवगीत। धर्मेन्द्र जी,बधाई!

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  4. धर्मेन्द्र जी, गीत अच्छा बन पड़ा है, किन्तु यह सम्पूर्ण नवगीत नहीं है, क्योंकि आपने मुखड़े में जो एक संक्रांति का बिम्ब चुना है, उसे ही पूरे गीत में एक निर्मेय की तरह निभाने की कोशिश की है| नवगीत निर्मेय नहीं है| आशा है आप मेरे इस मन्तव्य को अन्यथा नहीं लेंगे| आपसे मेरी अपेक्षाएँ अधिक हैं, इसीलिए यह इस प्रकार की टिप्पणी की है| कुछ पंक्तियाँ अनूठी बन पड़ी हैं -उनके लिए मेरा हार्दिक साधुवाद स्वीकारें|

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    1. आदरणीय रवींद्र जी, मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। यह नवगीत थोड़ी जल्दी में लिखा था। इस पर दुबारा काम करूँगा। सादर

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  5. सूरज के ढाबे पर फिर से
    दहकी है तंदूरी आग
    मौसम आज परोसे मक्के
    की रोटी सरसों का साग
    बहुत बहुत सुन्दर बधाई.
    rachana

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  6. सूरज के ढाबे पर फिर से
    दहकी है तंदूरी आग
    मौसम आज परोसे मक्के
    की रोटी सरसों का साग

    कितने दिन तक मानव ऐसे कूड़ा खाएगा
    इक दिन सूरज मॉलों में भी ढाबा खुलवाएगा

    आपकी बात दिल तक पहुँची.

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