27 जनवरी 2012

१३. सूरज ने खोले नयन कोर

हट गया आवरण कोहरे का
सूरज ने खोले नयन कोर

नीड़ में दुबके बैठे आकुल
भोर हुई तो चहके खगकुल
खुले झरोखे हवा की सनसन
आकर तन में भरती सिहरन
कमल सरोवर पर अलि-राग
काँव-काँव कहीं करते काग
नव उमंग, मन में हलचल
हर्षित हैं तरु-पल्लव विभोर

संक्रांति मनाते हैं हिलमिल
खाते हैं आज सभी गुड़-तिल
सबके हैं हृदय मगन-मगन
खुशबू से महके घर-आँगन
भरता धरती का नवल कलस
अमृत लगता गन्ने का रस
आहट बसंत की चौखट पर
कृषकों के मन लेते हिलोर

है नीलगगन पर रंग छाया
मौसम पतंग का फिर आया
उड़तीं फरफर रुमालों सी
मंझा लिपटी है बालों सी
झूम-झूमकर, इठला कर
जीत-हार की होड़ लगा कर
ऊपर जाकर उड़तीं नभ पर
छत-मुँडेर हर जगह शोर

-शन्नो अग्रवाल
लंदन से

9 comments:

  1. धर्मेन्द्र जी, रचना की सराहना और प्रेरणा दायक शब्दों के लिये आपका हार्दिक धन्यबाद.

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  2. लन्दन में बैठकर माटी से जुड़ी सुन्दर कविता |शन्नो जी बधाई |

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  3. शशि पाधाJan 27, 2012 05:55 PM

    नवगीत अच्छा लगा शन्नो जी, बधाई |
    शशि पाधा

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  4. शन्नो जी!
    अच्छा प्रयास. नव गीत के तत्वों का अधिक समावेश करें.

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  5. विमल कुमार हेडाJan 27, 2012 08:27 PM

    संक्रांति मनाते हैं हिलमिल, खाते हैं आज सभी गुड़-तिल
    सबके हैं हृदय मगन-मगन, खुशबू से महके घर-आँगन
    अति सुन्दर, शान्नो जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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  6. जयकृष्ण जी, शशि जी एवं विमल जी, आपकी उत्साहबर्धक टिप्पणियों के लिये हार्दिक धन्यबाद.

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  7. आदरणीय सलिल जी, आपकी हौसला अफजाई का बहुत-बहुत धन्यबाद.

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  8. जयकृष्ण जी, शशि जी एवं विमल जी, आपकी उत्साहबर्धक टिप्पणियों के लिये हार्दिक धन्यबाद.

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