26 जनवरी 2012

१२. रे सूरज तू चलते रहना

रात अमा ने बाँधे घेरे
निशितारों ने डाले डेरे
उदयाचल के खोल झरोखे
सूरज तू तो जलते रहना
कलश ज्योत के भरते रहना

अम्बर की गलियों में कब से
राहू-केतु घूम रहे
अँधियारे की चादर ओढ़े
काले मेघा झूम रहे
किरणों की थामे कंदीलें
नभ गँगा में तरते रहना
ज्योतिर्मय तू चलते रहना

युगों- युगों के तापस तुम संग
ताप तपस्या मैं तप लूँगी
माघ-पोष की ठिठुरन बैरिन
आस तेरी में मैं सह लूँगी
जानूँ तुम फाल्गुन के आते
भेजोगे वासन्ती गहना
तू जाने, तुझसे क्या कहना

दूर क्षितिज पर रेखाओं ने
ओढ़ी है सतरंगी चूनर
उड़ी पतंगें मनुहारों की
शाख –शाख ने बाँधे झूमर
छू लेना पर्वत का मस्तक
धीर धरा का धरते रहना

रे सूरज तू चलते रहना !!!!!

शशि पाधा
यू.एस.ए. से

17 टिप्‍पणियां:

  1. इस सुंदर नवगीत के लिए शशि पाधा जी को बहुत बहुत बधाई।

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    1. धर्मेन्द्र जी,
      गीत पसंद आया, धन्यवाद |

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  2. अति सुंदर शब्दों से सजा हुआ अति सुंदर गीत! बधाई शशि जी!

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    1. कल्पना जी,

      आपने गीत को पढ़ा और सराहा, धन्यवाद |

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  3. उत्तम द्विवेदी26 जनवरी 2012 को 7:54 pm

    शशि पाधा जी को सुंदर नवगीत के लिए बधाई!

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    1. उत्तम जी,

      हार्दिक धन्यवाद स्वीकारें |

      शशि पाधा

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  4. प्रिय शशि पाधा जी,
    एक श्रेष्ठ गीत के लिए मेरा हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद स्वीकारें| कुछ अछूते सन्दर्भ एवं बिम्ब इस गीत में प्रस्तुत हुए हैं, जो इसे नवगीत की भंगिमा देते हैं| कुछ पंक्तियाँ विशेष रुचीं, यथा -
    अम्बर की गलियों में कब से
    राहू-केतु घूम रहे
    अँधियारे की चादर ओढ़े
    काले मेघा झूम रहे
    किरणों की थामे कंदीलें
    नभ गँगा में तरते रहना
    ज्योतिर्मय तू चलते रहना

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    1. आदरणीय कुमार रवीन्द्र जी,

      आपके द्वारा लिखे शब्द मुझे सदैव प्रेरणा देते रहेंगे | मैं गीत और नवगीत के बीच की क्षीण रेखा को समझने का प्रयत्न कर रही हूँ और अपने बिम्ब, उपमान लोक संस्कृति तथा आंचलिक परिवेश में ढूँढती रहती हूँ | नवगीत की पाठशाला से जुड़ कर ही नवगीत लिखने लगी , पहले गीत ही लिखती थी | प्रेरणा का संबल साथ रहे , इन्हीं शुभ कामनायों के साथ ,
      शशि पाधा

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  5. उत्तर
    1. शारदा जी,
      आपाका हार्दिक धन्यवाद |
      शशि पाधा

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  6. बहुत सुंदर नवगीत. बधाई.

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  7. युगों- युगों के तापस तुम संग
    ताप तपस्या मैं तप लूँगी
    माघ-पोष की ठिठुरन बैरिन
    आस तेरी में मैं सह लूँगी
    जानूँ तुम फाल्गुन के आते
    भेजोगे वासन्ती गहना
    तू जाने, तुझसे क्या कहना

    शशि ने की रवि वंदना, मिला अमित आनंद.
    वासंती गहना ल्पहन पहन, रचें नित्य नव छंद..

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    1. बहुत -बहुत धन्यवाद संजीव जी |

      सादर

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  8. विमल कुमार हेडा28 जनवरी 2012 को 8:17 am

    अम्बर की गलियों में कब से, राहू-केतु घूम रहे
    अँधियारे की चादर ओढ़े, काले मेघा झूम रहे
    किरणों की थामे कंदीलें,नभ गँगा में तरते रहना
    ज्योतिर्मय तू चलते रहना
    सुन्दर पंक्तियाँ शशि पाधा जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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    1. विमल कुमार जी ,

      हार्दिक धन्यवाद |

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  9. उत्तर
    1. धन्यवाद प्रभुदयाल जी |

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