28 जनवरी 2012

१४. धूप धूप गाने के

कुहरे को ओढ़ने
बिछाने के दिन आए
दिन आए
धूप धूप गाने के

शाखों नने झूमकर बुने
किरणों के गीत कुनकुने
देहों को
बाँसुरी बनाने के
दिन आए
धूप धूप गाने के

छुअनें सब तितलियाँ हुईं
खुल के हँसती छुई मुई
सुधियों की
औस में नहाने के
दिन आए
धूप धूप गाने के

हरीश निगम
-सतना से

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर।
    आज सरस्वती पूजा निराला जयन्ती
    और नज़ीर अकबारबादी का भी जन्मदिवस है।
    बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. बहुत सुंदर नवगीत है, हरीश जी को बहुत बहुत बधाई

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  3. परमेश्वर फुंकवाल28 जनवरी 2012 को 5:00 pm

    हरीश जी, धुप के इस कुनकुने अहसास से परिचय करने के लिए धन्यवाद. बहुत सुन्दर गीत.

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