21 मार्च 2012

२. फूल हँसी के

हरसिंगार हुआ जीवन

भागमभाग सुबह से मचती
रोज शहर में
हाट, सड़क, मंदिर, विद्यालय
घर, दफ़्तर में
दिनभर सब की कनपट्टी पर
समय रखे रहता है गन

देर शाम जब थककर सूरज
आया करता
चंदा तारों से घर जगमग
पाया करता
फिर जादू का काढ़ा पीकर
लौटे सूरज का बचपन

फूल हँसी के देर रात तक
महका करते
पर छूते ही पहली किरणें
सब हैं झरते
है अजीब इस युग का साँचा
पर ढलता जाता तन मन

धर्मेन्द्र कुमार सिंह
बिलासपुर

13 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फुँकवाल22 मार्च 2012 को 1:09 pm

    जीवन की आपाधापी से दूर हरसिंगार को जीता गीत. बधाई धर्मेन्द्र जी सुन्दर गीत के लिए.

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  2. अनिल वर्मा, लखनऊ.23 मार्च 2012 को 11:14 am

    फूल हँसी के देर रात तक
    महका करते
    पर छूते ही पहली किरणें
    सब हैं झरते
    है अजीब इस युग का साँचा
    पर ढलता जाता तन मन
    ..बहुत ही सुंदर. निःशब्द करती रचना के लिए बधाई धर्मेन्द्र जी.

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    1. निःशब्द तो आपकी इस उत्साहवर्द्धक टिप्पणी ने कर दिया अनिल जी, बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. विमल कुमार हेड़ा।26 मार्च 2012 को 8:28 am

    देर शाम जब थककर सूरज आया करता
    चंदा तारों से घर जगमग पाया करता
    फिर जादू का काढ़ा पीकर लौटे सूरज का बचपन
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ धर्मेन्द्रजी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेड़ा।

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  4. देर शाम जब थककर सूरज
    आया करता
    चंदा तारों से घर जगमग
    पाया करता
    फिर जादू का काढ़ा पीकर
    लौटे सूरज का बचपन

    फूल हँसी के देर रात तक
    महका करते
    पर छूते ही पहली किरणें
    सब हैं झरते
    है अजीब इस युग का साँचा
    पर ढलता जाता तन मन

    अपनी समर्थशब्दतूलिका से नवगीत के कैनवास पर जीवन की आपाधापी को इतनी बारीकी से उकेड़ने के लिए हार्दिक बधाई भाई धर्मेन्द्र जी

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  5. अपनी समर्थशब्दतूलिका से नवगीत के कैनवास पर जीवन की आपाधापी को एकबार फिर इतनी बारीकी से उकेड़ने के लिए भाईधर्मेन्द्र जी एवं टीम नवगीत को हार्दिक बधाई.

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  6. भागमभाग सुबह से मचती
    रोज शहर में
    हाट, सड़क, मंदिर, विद्यालय
    घर, दफ़्तर में
    दिनभर सब की कनपट्टी पर
    समय रखे रहता है गन
    आपके शब्द और भाव अनूठे हैं मन को मोहित करते हैं आप सदा ही बहुत अच्छा लिखते हैं
    बधाई
    रचना

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  7. बहुत बहुत धन्यवाद रचना जी, स्नेह बनाए रखें

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  8. देर शाम जब थककर सूरज
    आया करता
    चंदा तारों से घर जगमग
    पाया करता
    फिर जादू का काढ़ा पीकर
    लौटे सूरज का बचपन

    हरसिंगार को जीवन से सम्बद्ध करता सार्थक नवगीत पढ़ाने हेतु आभार.

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