26 मार्च 2012

७. एक भरम

चलो यार
एक भरम टूट गया
मुट्ठी से हरसिंगार छूट गया

पीतल के छल्ले पर
प्यार की निशानी
उसकी नादानी
ठगी गयी फिर शकुंतला
कोई दुष्यंत उसे लूट गया

आँखों की मछली ने
जाल कल बुने थे
इन्द्रधनु चुने थे
पानी मर गया धूप का
स्वर्णमुखी मंगलघट फूट गया

-डॉ. भारतेन्दु मिश्र
नई दिल्ली

12 टिप्‍पणियां:

  1. भारतेन्दु जी का ये नवगीत पाठशाला के लिए एक आदर्श नवगीत की तरह है। मुखड़े से अंतरे तक हर पंक्ति में सिद्धहस्त नवगीतकार की छाप स्पष्ट दिखती है। बहुत बहुत बधाई भारतेन्दु जी को

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. डा० भारतेंदु मिश्र जी की रचना बहुत अच्छी लगी .कम शब्दों में कथ्य प्रकट करना वास्तव में श्रेष्ठ कलात्मकता का परिचायक है .स्वर्णिम घट सागर समाए हुए है .बहुत कुछ सीखने को मिला है .

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. आँखों की मछली ने
    जाल कल बुने थे
    इन्द्रधनु चुने थे
    पानी मर गया धूप का
    स्वर्णमुखी मंगलघट फूट गया
    बहुत सुन्दर गहरे भावों को प्रभावी शब्दों से सजाया है ...भारतेंदु मिश्र जी को बधाई

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. अनिल वर्मा, लखनऊ.27 मार्च 2012 को 12:28 pm

    पीतल के छल्ले पर
    प्यार की निशानी
    उसकी नादानी
    ठगी गयी फिर शकुंतला
    कोई दुष्यंत उसे लूट गया

    एक भरम टूट गया
    ...बहुत खूब भारतेंदु जी. रचना ने स्तब्ध कर दिया. बधाई.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. परमेश्वर फुंकवाल27 मार्च 2012 को 3:19 pm

    'पानी मर गया धूप का' और उसके बिना मछली क जीवन क्षरण, बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं. लघुता इस गीत क गहना है. बधाई भारतेंदु जी को.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. सबसे पहले तो पूर्णिमा जी के प्रति आभार कि उन्होने मेरे इस गीत को चौपाल मे रखा। साथ ही धर्मेन्द्र जी,ज्योतिर्मयी जी और सन्ध्या सिंह जी प्रशंसापरक विचारो के लिए धन्यवाद।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. चलो यार
    एक भरम टूट गया.
    उक्त नवगीत अपने कथ्यगत एवं भावगत वैशिष्ट्य के साथ शिल्पगत वैशिष्ट्य में बेजोड़ है.निश्चित रूप से अकेला ही पाठशाला की तरह.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  8. आदरणीय भारतेंदु जी,
    इतना सुन्दर नवगीत , इसके विषय में कुछ भी लिखें तो कम है |
    ऐसे गीत कुछ नया लिखने को प्रेरित करते हैं | बहुत - बहुत बधाई |
    शशि पाधा

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  9. एक अनुपम नवगीत के लिए धन्यवाद | ऐसी सुन्दर रचनाओं की टिप्पणी के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं | आभार आपका आदरणीय भारतेंदु जी |

    शशि पाधा

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  10. पीतल के छल्ले पर
    प्यार की निशानी
    उसकी नादानी
    ठगी गयी फिर शकुंतला
    कोई दुष्यंत उसे लूट गया
    सुन्दर नवगीत सम्पूर्ण है ऐसे नवगीत पर मुझ जैसे सीखने वाले क्या लिखेंगे
    सादर
    रचना

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  11. आँखों की मछली ने
    जाल कल बुने थे
    इन्द्रधनु चुने थे
    पानी मर गया धूप का
    स्वर्णमुखी मंगलघट फूट गया
    अद्भुत लगीं ये पंक्तियाँ, भारतेन्दु भाई| साधुवाद !

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  12. चलो यार
    एक भरम टूट गया
    मुट्ठी से हरसिंगार छूट गया

    वाह... वाह... गागर में सागर... गांवों की 'कम लिखे को अधिक समझना' से पत्र समापन की प्रथा को जीवित करता सशक्त नवगीत. हार्दिक बधाई.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।