25 मार्च 2012

६. मन हरसिंगार

तन उपवन
मन हरसिंगार

सरगम छेड़े पल-छिन
जलतरंग बाँह में
ऋतु ला बिछाए सब
रंग इसी छाँह में
करवट लिए मचला रहे
सिसके हँसे पीड़ा सहे
इस बाग़-वन
उस झील पार
हरसिंगार !

जुगनुओं की ज्योति पर
परीकथा लिखे
चरणामृत प्यास की
मरीचिका चखे
दौड़े थमे सँभले कभी
बिगड़े बने सँवरे कभी
तोड़े बुने
सपनों के हार
हरसिंगार !

-अश्विनी कुमार विष्णु
अकोला

7 टिप्‍पणियां:

  1. विमल कुमार हेड़ा।26 मार्च 2012 को 8:08 am

    जुगनुओं की ज्योति पर परीकथा लिखे
    चरणामृत प्यास की मरीचिका चखे
    दौड़े थमे सँभले कभी बिगड़े बने सँवरे कभी
    तोड़े बुने सपनों के हार हरसिंगार !
    अति सुन्दर, सुन्दर गीत के लिये अश्विनी कुमार जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेड़ा।

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  2. अनिल वर्मा, लखनऊ.26 मार्च 2012 को 7:35 pm

    तन उपवन
    मन हरसिंगार
    बहुत ही सूक्ष्म कल्पना को मोहक विस्तार दे कर गढ़ी रचना बहुत ही सुंदर. बधाई विष्णु जी.

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  3. पूरा नवगीत बहुत सुंदर है। अश्विनी जी को बहुत बहुत बधाई

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  4. जुगनुओं की ज्योति पर
    परीकथा लिखे
    चरणामृत प्यास की
    मरीचिका चखे
    बहुत सुन्दर गीत .....अश्विनी जी.... हमेशा की तरह

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  5. दौड़े थमे सँभले कभी
    बिगड़े बने सँवरे कभी
    तोड़े बुने
    सपनों के हार
    हरसिंगार

    बहुत सुन्दर शब्द संयोजन | सुन्दर नवगीत के लिए धन्यवाद
    शशि पाधा

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  6. सरगम छेड़े पल-छिन
    जलतरंग बाँह में
    ऋतु ला बिछाए सब
    रंग इसी छाँह में
    करवट लिए मचला रहे
    सिसके हँसे पीड़ा सहे
    इस बाग़-वन
    उस झील पार
    हरसिंगार !
    सुन्दर नवगीत

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  7. दौड़े थमे सँभले कभी
    बिगड़े बने सँवरे कभी
    तोड़े बुने
    सपनों के हार
    हरसिंगार !

    क्या बात है? हरसिंगार को स्वप्न हार से जोड़ता मनहर गीत.

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