6 अप्रैल 2012

१८. फूल हरसिंगार के

बाँध दिए
नज़रों से फूल हरसिंगार के
तुमने कुछ बोल दिया
चर्चे हैं प्यार के

मौसम का
रंग-रूप और अधिक निखरा है
सैलानी मन मेरा आसपास बिखरा है
आज मिला कोई बिन चिट्ठी,
बिन तार के

उतरे हैं
पंछी ये झुकी हुई डाल से
रिझा गया कोई फिर नैन, नक्श, चाल से
टीले मुस्तैद खड़े जुल्फ़ को
संवार के

बलखाती
नदियों के संग आज बहना है
अनकहा रहा जो कुछ आज वही कहना है
अब तक हम दर्शक थे नदी के
कगार के

- जयकृष्ण राय तुषार
इलाहाबाद

7 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फुंकवाल7 अप्रैल 2012 को 8:42 am

    आ जयकृष्ण राय जी, बहुत रसीले प्रेमगीत के लिए बधाई.
    'मौसम का
    रंग-रूप और अधिक निखरा है
    सैलानी मन मेरा आसपास बिखरा है
    आज मिला कोई बिन चिट्ठी,
    बिन तार के'
    बहुत सरल शब्दों में अप्रतिम सौंदर्य को जिया है आपने इस गीत में.

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  2. गीत में हल्का संशोधन कर दें
    बांध रहे
    नज़रों को
    फूल हरसिंगार के |
    आभार

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  3. बहुत सुंदर अनकहा कह रही है रचना आपकी ....

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  4. बहुत ही सुंदर प्रेमगीत है, बहुत बहुत बधाई जयकृष्ण राय जी को

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  5. बहुत ही सुंदर नवगीत है। जयकृष्ण राय जी को बहुत बहुत बधाई

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  6. प्रेम और शृंगार का अप्रतिम मिश्रण है इस नवगीत में | बधाई और धन्यवाद |

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  7. उतरे हैं
    पंछी ये झुकी हुई डाल से
    रिझा गया कोई फिर नैन, नक्श, चाल से
    टीले मुस्तैद खड़े जुल्फ़ को
    संवार के
    भावों और शब्दों का सुंदर संगम है आपका नवगीत
    बधाई आपको
    रचना

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