बढ़े धूप के तेवर रूठी,
आँगन की तुलसी।
सींच न पाई गृहिणी उसको,
जल का था टोटा।
कोने में चुपचाप पड़ा था,
मैला-सा लोटा।
ऊपर से गर्मी का भारी,
आन पड़ा सोटा।
मुरझाई बिन पानी प्यासी,
पावन-सी तुलसी।
छायावाले छप्पर में भी,
छिद्रों का था जाल।
ताप तपा तपकर सिर पहुँचा,
बना काल तत्काल।
लड़े अंत तक कोमल पत्ते,
सूख हुए कंकाल।
दम टूटा पतझड़ में बदली,
सावन-सी तुलसी।
सूखी तुलसी लेकिन उसके,
बीज सदैव हरे।
फिर से नव अंकुर फूटेंगे,
जब जलबूँद गिरे।
गृहिणी के भी दिन बदलेंगे,
जैसे समय फिरे।
लहराएगी फिर ममता के,
दामन-सी तुलसी।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
आँगन की तुलसी।
सींच न पाई गृहिणी उसको,
जल का था टोटा।
कोने में चुपचाप पड़ा था,
मैला-सा लोटा।
ऊपर से गर्मी का भारी,
आन पड़ा सोटा।
मुरझाई बिन पानी प्यासी,
पावन-सी तुलसी।
छायावाले छप्पर में भी,
छिद्रों का था जाल।
ताप तपा तपकर सिर पहुँचा,
बना काल तत्काल।
लड़े अंत तक कोमल पत्ते,
सूख हुए कंकाल।
दम टूटा पतझड़ में बदली,
सावन-सी तुलसी।
सूखी तुलसी लेकिन उसके,
बीज सदैव हरे।
फिर से नव अंकुर फूटेंगे,
जब जलबूँद गिरे।
गृहिणी के भी दिन बदलेंगे,
जैसे समय फिरे।
लहराएगी फिर ममता के,
दामन-सी तुलसी।
कल्पना रामानी
नवी मुंबई
bahut sundar abhivyakti ...
जवाब देंहटाएंshubhkamnayen..
धन्यवाद अनुपमा जी
हटाएंअनुपमा जी,बहुत धन्यवाद
हटाएंबधाई बहन कल्पना रामानी जी इस सुंदर नवगीत के लिए| इसकी बिम्ब-योजना सम्मोहक है|
जवाब देंहटाएंआ॰ कुमार रवीन्द्र जी,आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है। आपके नवगीतों से हमें बहुत प्रेरणा मिलती है। आपका हार्दिक धन्यवाद।
हटाएंबहुत सुन्दर नवगीत पावन पवित्र ....अंतिम अंतरा बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है ...शुभकामनाएं कल्पना जी
जवाब देंहटाएंलहराएगी फिर ममता के,
जवाब देंहटाएंदामन-सी तुलसी।
बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ. आँगन की तुलसी के माध्यम से गर्मी का सजीव चित्र उपस्थित करते सुन्दर नवगीत के लिए बधाई कल्पना जी.
अनिल जी, बहुत धन्यवाद!
हटाएंलहराएगी फिर ममता के
जवाब देंहटाएंदामन सी तुलसी ।
.....बहुत सुन्दर ।
आपका हार्दिक धन्यवाद1
हटाएंआशावादी सुंदर गीत जन्मदिन की बधाई के साथ .
जवाब देंहटाएंमंजु जी सुंदर टिप्पणी के लिए धन्यवाद
हटाएंगृहिणी के भी दिन बदलेंगे,
जवाब देंहटाएंजैसे समय फिरे।
लहराएगी फिर ममता के,
दामन-सी तुलसी। ...एक पावन पवित्र रचना ...तुलसी माता का यह गीत
ग्रीष्म ऋतु की एक दुखद कहानी होते हुए भी अंत में एक नयी उम्मीद के साथ समाप्त होता है ....सुन्दर गीत के लिए बधाई
संध्या जी उत्साह वर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
हटाएंसूखी तुलसी लेकिन उसके,
जवाब देंहटाएंबीज सदैव हरे।
फिर से नव अंकुर फूटेंगे,
जब जलबूँद गिरे... नव आशा का संचार करती पंक्तियाँ. सुन्दर नवगीत. जन्मदिन की बधाई के साथ...
परमेश्वर जी हार्दिक धन्यवाद
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर नवगीत है कल्पना जी, बधाई कुबूल करें
जवाब देंहटाएंअनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ..
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार
हटाएंसुंदर नवगीत....
जवाब देंहटाएंसादर बधाई।
हार्दिक धन्यवाद आपका
हटाएंनवाअशाओं के प्रतीक के रूप में’तुलसी’ का चित्रण सुंदर बन पडा है.
जवाब देंहटाएंजीवन में आशा का दीप जलता रहेगा—जैसे,तुलसी के विरबे के नीचे
सांध्यदीप.
प्रशंसात्मक टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
हटाएंकल्पना जी, आपका यह नवगीत हर दृष्टि से इतना सशक्त है कि शब्द कम पड़ रहे हैं टिप्पणी के लिए |पावन तुलसी के माध्यम से गर्मी की भीषणता का चित्रण करते हुए सभी बिम्ब मन मोह लेते हैं | कल्पना जी आप को भविष्य के लिए भी बहुत सी शुभ कामनाएं |
जवाब देंहटाएंशशि जी, प्रोत्साहित करती हुई टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
हटाएंसुंदर, मन मोहक नवगीत के लियें
जवाब देंहटाएंबधाई स्वीकार करें कल्पना जी...
गीता जी, हार्दिक धन्यवाद!
हटाएंबहुत ही सुंदर नवगीत ........
जवाब देंहटाएंतुलसी के विविध शब्दचित्रों के माध्यम से कल्पना जी ने विविध मनःस्थितियों को जीवंत किया है. बधाई. मार्मिकता इस नवगीत का वैशिष्ट्य है. मुरझाने और पतझड़ से दम तोड़ने तक की यात्रा के पश्चात् नव जीवन का संकेत रचना को खास बनाता है. बधाई....
जवाब देंहटाएंसंजीव जी, गीत की इतनी अच्छी समीक्षा के लिए हार्दिक आभार!
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