7 जून 2012

६. कैसी बात हो गई

दहकने लगा है नभ
धरा भी दग्ध हो गई
कैसी बात हो गई ?

बादलों के दल किसी
दूर देस जा बसे
राजसी पोशाक में
सूर्य खिल खिल हँसे
षोडशी धूप आज
राज रानी
हो गई
कैसी बात हो गई ?

दिन लंबे हो गए
ताड़ के पेड़ से
गिर पड़ी है ऊँघती
हवा भी गर्म मेंड़ से
गुनगुने ताल में
रात मुँह
धो गई
कैसी बात हो गई ?

झिलमिलाने लगीं
झील में परछाइयाँ
पनघटों की भीड़ में
गीत, गलबाहियाँ
पसीजती चाँदनी
ओस कण
बो गई
कैसी बात हो गई ?

छाँव का मोल आज चौगुणा
हो गया
धूप के हाट में
चैन कहीं खो गया
जेठ की दुपहरी
आँख मूँद
सो गई
कैसी बात हो गई ?

शशि पाधा
यू.एस.ए.

19 टिप्‍पणियां:

  1. विमल कुमार हेड़ा।8 जून 2012 को 8:31 am

    छाँव का मोल आज चौगुणा हो गया
    धूप के हाट में चैन कहीं खो गया
    अति सुन्दर, शशि पाधा जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्यवाद
    विमल कुमार हेडा

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:45 pm

      विमल कुमार जी,
      अपनी पसंद की पंक्तियों को रेखांकित करने के लिए और गीत को सराहने के लिए आपका धन्यवाद |

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  2. परमेश्वर फुंकवाल8 जून 2012 को 11:54 am

    दिन लंबे हो गए
    ताड़ के पेड़ से
    गिर पड़ी है ऊँघती
    हवा भी गर्म मेंड़ से
    गुनगुने ताल में
    रात मुँह
    धो गई...इन पंक्तियों ने ग्रीष्म को आइना दिखा दिया है. सम्मोहक नवगीत के लिए बधाई आ शशी जी.

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  3. सुंदर गीत के लिए शशि पाधा जी को बधाई

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:46 pm

      हार्दिक धन्यवाद धर्मेन्द्र जी |
      शशि पाधा

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  4. प्रकृति का सुंदर वर्णन और सुंदर नवगीत। बधाई शशि जी!

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:48 pm

      सुशीला जी, प्रकृति ही मेरी कलम की नोक पर बैठी मुझसे लिखवाती है | आपका बहुत बहुत आभार |
      शशि पाधा

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  5. गिर पड़ी है ऊँघती
    हवा भी गर्म मेंड़ से
    गुनगुने ताल में
    रात मुँह
    धो गई
    ........ बहुत सुंदर ...
    बधाई दी! आपको....

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  6. गुनगुने ताल मेँ
    रात मुँह
    धो गई
    कैसी बात हो गई ।
    ... सुन्दर रचना ।

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:50 pm

      आपको यह पंक्तियाँ पसंद आईं, गीत पसन्द करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सुरेन्द्रपाल जी |
      शशि पाधा

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  7. सुंदर नवगीत के लिए बधाई शशि जी

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:51 pm

      धन्यवाद कल्पना जी, आपकी कल्पना और लेखनी को नमन |
      शशि पाधा

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  8. परमेश्वर फुंकवाल9 जून 2012 को 6:00 pm

    दिन लंबे हो गए
    ताड़ के पेड़ से
    गिर पड़ी है ऊँघती
    हवा भी गर्म मेंड़ से
    गुनगुने ताल में
    रात मुँह
    धो गई ...बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं. अच्छे नवगीत के लिए आ शशी जी को बधाई.

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  9. शशि पाधा जी का यह नवगीत परीकथाओं के राजकुमारों की स्मृति में सूरज को राजसी पोशाक में तथा धूप को राजरानी के रूप में देखता है. बिम्ब सटीक है. बधाई. 'ताड़ के पेड़' मुहावरे का प्रयोग अच्छा हुआ है. हवा का तालाब में मुँह धोना... क्या बात है.

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    1. शशि पाधा11 जून 2012 को 7:54 pm

      आदरणीय संजीव जी, आपसे बहुत कुछ सीखा है और लगातार सीख रहे है विशेषतय:दोहा छन्द | इस गीत के बिम्बों को रेखांकित करने के लिए आपका आभार |
      शशि पाधा

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  10. आपका गीत मोहक प्रतीकों से सजा है ...एक सुन्दर नवगीत हेतु बधाई शशि पाधा जी

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    1. शशि पाधा13 जून 2012 को 5:51 am

      संध्या जी,

      धन्यवाद आपका |

      हटाएं
  11. आपका गीत मोहक प्रतीकों से सजा है ...एक सुन्दर नवगीत हेतु बधाई शशि पाधा जी

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  12. परमेश्वर फुंकवाल14 जून 2012 को 10:16 am

    दिन लंबे हो गए
    ताड़ के पेड़ से
    गिर पड़ी है ऊँघती
    हवा भी गर्म मेंड़ से
    गुनगुने ताल में
    रात मुँह
    धो गई ...इन पंक्तियों को पढकर लगता है कि कितना सुन्दर खाका एक कलाकार खींच सकता है शब्दों के माध्यम से. सुन्दर गीत हेतु बधाई आ शशी जी.

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