16 सितंबर 2012

६. पूँछें उपलब्धियाँ हुईं

प्रहर, दिवस, मास, वर्ष बीते
जीवन का
कालकूट पीते

पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढी
मन्त्रित, निस्तब्ध सो गयी
युद्ध - भूमि में युयुत्सु पीढी
कन्धों पर
ले निषंग रीते

खुद ही अज्ञातवास ओढ़ कर
धनंजय बृहन्नला हुआ
मछली फिर तेल पर टंगी है
धनुष पडा किन्तु अनछुआ
कौन इस
स्वयम्वर को जीते

जाने कैसा निदाघ तपता है
आग भर गयी श्यामल घन में
दावानल कौन बो गया
चीड, शाल, देवदारु - वन में
अकुलाये सिंह,
व्याघ्र, चीते!

--धनंजय सिंह.
गाजियाबाद

11 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फुंकवाल16 सितंबर 2012 को 8:52 am

    पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
    खेलते हुए साँप-सीढी
    मन्त्रित, निस्तब्ध सो गयी
    युद्ध - भूमि में युयुत्सु पीढी
    कन्धों पर
    ले निषंग रीते....बहुत झकझोरती पंक्तियाँ. बहुत सुन्दर नवगीत आ धनञ्जय जी का.

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  2. सचमुच उत्कृष्ट गीत ....कितना मुश्किल मुखडा.. .
    प्रहर, दिवस, मास, वर्ष बीते
    जीवन का
    कालकूट पीते..
    और कितना सुन्दर निर्वाह .....ह्रदय से बधाई धनञ्जय जी को

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  3. उत्तम द्विवेदी16 सितंबर 2012 को 12:42 pm

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से नवजागृति प्रदान करनेवाला नवगीत प्रशंसनीय है.

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  4. कालकूट पीने के समान ही तो
    है यह जीवन का संघर्ष....।
    जीवन का यथार्थ चित्रण करते नवगीत के लिए बधाई ।

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  5. इस शानदार नवगीत के लिए धनंजय जी को बधाई

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  6. एक अनुपम नवगीत | बधाई आपको |

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  7. बहुत सुंदर नवगीत के लिए धनंजय जी को हार्दिक बधाई।

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  8. अनिल वर्मा, लखनऊ.21 सितंबर 2012 को 7:49 am

    अकुलाये सिंह,
    व्याघ्र, चीते!

    प्रहर, दिवस, मास, वर्ष बीते
    जीवन का
    कालकूट पीते
    बहुत ही मोहक रचना. बधाई धनञ्जय जी.

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  9. पौराणिक प्रतीकों के साथ सुन्दर नवगीत धनञ्जय सिंह जी का.



    प्रहार वर्ष दिवस मास बीते

    जीवन का

    कालकूट पीते.

    .......

    युद्ध भूमि में युयुत्सु पीढ़ी

    ले निषंग रीते.

    क्या अंदाज़ है बयानी का. ..



    खुद ही अज्ञातवास ओढ़

    धनञ्जय ब्रहन्नला हुआ. ......



    जाने कैसा निदाघ तपता है

    आग भर गयी श्यामल घन में.

    .....

    अकुलाये सिंह व्याघ्र चीते.



    खूबसूरत नवगीत.

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  10. बहुत सुंदर नवगीत ..
    बधाई आपको सर ..

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