24 सितंबर 2012

१५. आसमान के पार स्वर्ग है

आसमान के पार स्वर्ग है
सोच चला घर से
जाकर देखा वहाँ अँधेरा दीपक को तरसे

पर्वत पर चढ़ने को माटी का आँचल छोड़ा
हरियाली ने धीरे धीरे मुझसे मुँह मोड़ा
थोड़ा और चढ़ा ऊपर तो
मिले बर्फ़ के दिल
आसमान छूने का लेकिन
नशा बड़ा कातिल
इससे ऊपर प्रेम-मेघ से भी हिम ही बरसे

जीवन का पौधा उगता हिमरेखा के नीचे
धार प्रेम की जहाँ नदी बन धरती को सींचे
आसमान से आम आदमी
लगता है चींटी
नभ केवल रंगीन भरम है
सच्चाई मिट्टी
गिर जाता जो अंबर से वो मरता है डर से

अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ
आसमान पर कहाँ बसा है
कभी किसी का घर
ज्यादा जोर लगाया जिसने
टूटे उसके पर
फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से

-धर्मेन्द्र सिंह सज्जन
बिलासपुर

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर. धर्मेन्द्र जी को बधाई

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  2. परमेश्वर फुंकवाल24 सितंबर 2012 को 1:02 pm

    बहुत अच्छा लगा आपका नवगीत धर्मेन्द्र जी. आपके नवगीत हमेशा नवीनता लिए होते है, यहाँ भी आपने एक नया दृष्टिकोण रखा है जो वैज्ञानिक भी है और व्यावहारिक भी. आपको बहुत बहुत बधाई.

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  3. ज्यादा जोर लगाया जिसने
    टूटे उसके पर
    फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से
    बहुत सुन्दर गीत है ...सार्थक सन्देश के साथ ...बधाई धर्मेन्द्र जी को

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  4. उत्तम द्विवेदी24 सितंबर 2012 को 6:13 pm

    विचारों की गहनता में पिरोए हुए सुन्दर नवगीत के लिए धर्मेन्द्र जी को बधाई।

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल २५/९/१२ मंगलवार को चर्चाकारा राजेश कुमारी के द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है

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  6. अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
    दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ...

    जमीन से जुड़े रहने का संदेश देते नवगीत के लिए
    धर्मेन्द्र सिंह जी को बहुत बहुत बधाई ।

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  7. अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
    दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ...

    जमीन से जुड़े रहने का संदेश देते नवगीत के लिए
    धर्मेन्द्र सिंह जी को बहुत बहुत बधाई ।

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  8. सुन्दर नवगीत.....बधाई धर्मेन्द्र जी
    डॉ सरस्वती माथुर
    ......

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  9. अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
    दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ
    आसमान पर कहाँ बसा है
    कभी किसी का घर
    ज्यादा जोर लगाया जिसने
    टूटे उसके पर
    फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से

    .. आज के युवा के लियें एक बड़ी सीख .. बहुत सुंदर .. बधाई धर्मेन्द्र जी...

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  10. नवगीत की आम कहन से अलग होते हुए भी धर्मेन्द्र जी का यह गीत, सच में, अद्भुत बन पड़ा है| इसका मुखड़ा और पहला पद तो अनूठा ही है| धर्मेन्द्र जी को इस श्रेष्ठ गीत के लिए मेरी हार्दिक बधाई|

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद रवींद्र जी, आप के समीक्षात्मक टिप्पण भविष्य के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं

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  11. विमल कुमार हेड़ा26 सितंबर 2012 को 8:33 am

    आसमान पर कहाँ बसा है,कभी किसी का घर
    ज्यादा जोर लगाया जिसने, टूटे उसके पर
    एक अच्छा संदेश देती यह रचना, धर्मेन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई।
    विमल कुमार हेड़ा

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  12. अनिल वर्मा, लखनऊ.27 सितंबर 2012 को 3:02 pm

    आसमान पर कहाँ बसा है
    कभी किसी का घर
    ज्यादा जोर लगाया जिसने
    टूटे उसके पर
    फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से
    बहुत ही सुन्दर. अंतिम पंक्ति तो बहुत कुछ बताती है.

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  13. विषय को व्यापक परिद्रश्य प्रदान करता आपका सुन्दर नवगीत धर्मेन्द्र जी.
    अंबर तक यदि जाना है तो चिड़िया बन जाओ
    दिन भर नभ की सैर करो पर संध्या घर आओ
    आसमान पर कहाँ बसा है
    कभी किसी का घर
    ज्यादा जोर लगाया जिसने
    टूटे उसके पर
    फैलो, काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से.

    सार्थक संदेश.

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