27 सितंबर 2012

१८. मन सुगना क्यों मौन स्वरों में करता क्रंदन


जीवन थाली में रखे हैं
सुख सुविधा के छप्पन व्यंजन
मन सुगना क्यों
मौन स्वरों में करता क्रंदन

फटी बिवाई
तन पर एक कौपीन सलूका
बारहमासे
कभी तीज त्यौहार
पूरियाँ खा इतराते दिन
इनके उनके सुख दुःख सबके
छप्पर से समवेत करों में
भार उठाते दिन

आवाजाही में कब टूटे
अपनेपन के बंधन

शहरी रंगमहल उछ्रंखल
राजनर्तकी तृष्णा
पूँजी प्याले में उंड़ेलती
अहंकार की हाला
क्या राजा क्या मंत्री चाकर
यहाँ टुन्न दो घूँट चढ़ाकर
नैतिकता की चींटी रौंदे
धन बल गज मतवाला

रूठा काकी के पैरों से
नत अभिनन्दन

आज हथेली में चंदा
पगथलियों में जग
नाप सके न मगर
पड़ोसी घर की दूरी दो पग
दो कमरे के बया घोंसले
अधिवासी सन्नाटे के खग
ऑफिस के टेबल पर उतरे
मोरपंखिया शाम
और बैठक में नभ नग

शायद ज़्यादा ही खोया कम पाया
कहता ये मन

रामशंकर वर्मा
लखनऊ

13 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फुंकवाल28 सितंबर 2012 को 8:15 am

    आज हथेली में चंदा
    पगथलियों में जग
    नाप सके न मगर
    पड़ोसी घर की दूरी दो पग
    दो कमरे के बया घोंसले
    अधिवासी सन्नाटे के खग
    ऑफिस के टेबल पर उतरे
    मोरपंखिया शाम
    और बैठक में नभ नग

    शायद ज़्यादा ही खोया कम पाया
    कहता ये मन ...वर्तमान की सम्पूर्ण कहानी कह देती हैं आपकी ये पंक्तियाँ. बहुत सुन्दर अंदाज है आपका. बधाई आपको इस सुन्दर नवगीत के लिए.

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    1. आ० बंधुवर फूंकवाल जी, उत्साहवर्धन और प्रशंसा के लिए आभार.

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    2. आ० बंधुवर फूंकवाल जी, उत्साहवर्धन और प्रशंसा के लिए आभार.

      हटाएं
  2. एक अच्छे नवगीत के लिए रामशंकर जी को बधाई।

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    उत्तर
    1. आभार ह्रदय से आ० धर्मेन्द्र जी.

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  3. विमल कुमार हेड़ा।29 सितंबर 2012 को 8:10 am

    शहरी रंगमहल उछ्रंखल, राजनर्तकी तृष्णा
    पूँजी प्याले में उंड़ेलती, अहंकार की हाला
    क्या राजा क्या मंत्री चाकर, यहाँ टुन्न दो घूँट चढ़ाकर
    नैतिकता की चींटी रौंदे, धन बल गज मतवाला
    सुन्दर पंक्तियाँ रमाशंकर जी को बहुत बहुत बधाई।
    विमल कुमार हेड़ा।

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  4. जीवन थाली में रखे हैं
    सुख सुविधा के छप्पन व्यंजन
    मन सुगना क्यों
    मौन स्वरों में करता क्रंदन
    बहुत सुंदर शुरुवात के साथ अंत तक प्रभावित करता हुआ नवगीत। रा मशंकर जी बधाई।

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  5. मूल्यांकन और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आ० रामानी जी.

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  6. अनिल वर्मा, लखनऊ.30 सितंबर 2012 को 8:39 pm

    फटी बिवाई
    तन पर एक कौपीन सलूका
    बारहमासे
    कभी तीज त्यौहार
    पूरियाँ खा इतराते दिन
    इनके उनके सुख दुःख सबके
    छप्पर से समवेत करों में
    भार उठाते दिन

    आवाजाही में कब टूटे
    अपनेपन के बंधन
    बहुत ही सुन्दर. खूबसूरत नवगीत के लिये बधाई रामशंकर जी.

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  7. बहूत सुन्दर भावपूर्ण चित्रण को समेटे नवगीत के लिए रामशंकर जी को बधाई ।

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  8. आज हथेली में चंदा
    पगथलियों में जग
    नाप सके न मगर
    पड़ोसी घर की दूरी दो पग
    दो कमरे के बया घोंसले
    अधिवासी सन्नाटे के खग
    ऑफिस के टेबल पर उतरे
    मोरपंखिया शाम
    बहुत गहरी पंक्तियाँ रामशंकर जी | बधाई और धन्यवाद |

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  9. फटी बिवाई
    तन पर एक कौपीन सलूका
    बारहमासे
    कभी तीज त्यौहार
    पूरियाँ खा इतराते दिन
    इनके उनके सुख दुःख सबके
    छप्पर से समवेत करों में
    भार उठाते दिन\
    सुन्दर नवगीत के लिए बधाई
    rachana

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