21 अक्तूबर 2012

२. फि‍र हम एक हुए

घर घर दीप जले,
लगता है,
फि‍र हम एक हुए

वैर द्वेष बह निकला मन से
भेंट अनुग्रह अधुनातन से
समय समर्थन अनुशासन से
दर दर प्रीत पले,
लगता है,
फि‍र हम एक हुए

गीतवृन्द‍ चौपाई दोहे
वाद्यवृन्द शहनाई मोहे
बालवृन्द तरुणाई सोहे
भिनसर गीत चले,
लगता है,
फि‍र हम एक हुए

चंदनवन में विषधर भटके
भ्रम संभ्रम के ताले चटके
सब त्योहार मनायें हटके
तम बस दीप तले,
लगता है,
फि‍र हम एक हुए

-आकुल

11 टिप्‍पणियां:


  1. गीतवृन्द‍ चौपाई दोहे
    वाद्यवृन्द शहनाई मोहे
    बालवृन्द तरुणाई सोहे
    भिनसर गीत चले,
    लगता है,
    फि‍र हम एक हुए
    बहुत सुंदर नवगीत के लिए आकुल जी को बधाई।

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  2. बहुत सुंदर नवगीत है। आकुल जी को बहुत बहुत बधाई

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  3. वैर द्वेष बह निकला मन से
    भेंट अनुग्रह अधुनातन से
    समय समर्थन अनुशासन से
    दर दर प्रीत पले,

    बहुत बढ़िया

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  4. घर घर दीप जले
    लगता है
    फिर हम एक हुए ।
    एकता के सन्देश का भाव लिए सुन्दर नवगीत । बधाई ।

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  5. कृष्ण नन्दन मौर्य25 अक्तूबर 2012 को 6:13 pm

    बहुत सुन्दर नवगीत आकुल जी को बधाई

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  6. सुन्दर नवगीत हेतु आकुल जी को बधाई

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  7. चंदनवन में विषधर भटके
    भ्रम संभ्रम के ताले चटके
    सब त्योहार मनायें हटके
    तम बस दीप तले,
    लगता है,
    फि‍र हम एक हुए
    अति सुंदर आकुलजी । बहुत खूब।

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