31 अक्तूबर 2012

१२. स्वस्ति - राशि भर दो

दीप-अवलियों से
यह अग-जग,
ज्योतिर्मय कर दो।

मटमैली संझा
अम्बर का धूसर रंग हुआ,
सूरज बुझा, कालिमा पसरी,
आंगन धुआँ-धुआँ।

जगे आज
आलोक सृष्टि में
स्वस्ति राशि भर दो

कहीं तिमिर अब
और न कर ले बघनख ही पैने,
सुआ-दिवस के
टूट न जाएँ सपनीले डैने,

ज्योतिपुंज से
दिग-दिगन्त को
जीवन से भर दो।

दुर्गा, वीणापाणि, लक्ष्मी
और महाकाली,
दिव्यान्तरण, ज्योति का क्षण
यह जगमग दीवाली,

आज अमा के शीष
ज्योति का
राजमुकुट धर दो।।

दिवाकर वर्मा

6 टिप्‍पणियां:

  1. भाई दिवाकर वर्मा का यह गीत, सच में, दीपपर्व-पूजन के स्वस्ति-वाचन जैसा बन पड़ा है| इसके लिए उनका एवं 'नवगीत पाठशाला' को मेरा हार्दिक साधुवाद|

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  2. आज अमा के शीष
    ज्योति का
    राजमुकुट धर दो

    सुन्दर रचना दिवाकर जी। बधाई

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  3. बहुत सुंदर नवगीत है दिवाकर जी का, उन्हें बहुत बहुत बधाई

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  4. बहुत सुन्दर नवगीत, और एक जिम्मेदार नागरिक की चिन्ता, वधाई-

    "कहीं तिमिर अब
    और न कर ले बघनख ही पैने"

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  5. जगे आज
    आलोक सृष्टि में
    स्वस्ति राशि भर दो....सुन्दर रचना दिवाकर जी। बधाई

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