11 दिसंबर 2012

२. बरस बीता कह गया

विदा होकर जाते-जाते,
बरस बीता कह गया।
नवल तुम वो पूर्ण करना,
जो नहीं मुझसे हुआ।

गगन बेशक छुआ लेकिन,
देश अनदेखा किया।
लोग रोटी मांगते थे,
चाँद लाकर दे दिया।
बूंद रक्षण कर न पाया,
अमिय घट, घटता गया,
होश आया, जब समय ने,
हाथ पकड़ा, चल, कहा।

अब तुम्हीं आज़ाद करना,
देश को जंजाल से।
मुक्त हर दीवार रखना,
मकड़ियों के जाल से।
जड़ों को जकड़े न दीमक,
रूप निज विकराल से,
आस का नव सूर्य तुम हो,
मैं हुआ बुझता दिया।

बदल देना नियम सारे,
खत्म सब मतभेद हों।
दफन केवल फाइलों में,
वायदे ना कैद हों।
मान्य होंगे दस्तखत,तेरे
तुम्हीं अब वैध हो,
तुम नई तारीख, मैं
जूना कैलेंडर अब हुआ।

जश्न तो होते रहेंगे,
युग बदलते जाएंगे।
नव सजेंगे सुर्खियों में,
पुरातन खो जाएंगे।
सब सुनेंगे मित्र, तुमको,
सब तुम्हें ही गाएँगे,
आज तुम नवगीत हो,मैं
गीत गुज़रा रह गया।

-कल्पना रामानी

9 टिप्‍पणियां:

  1. अब तुम्हीं आज़ाद करना,
    देश को जंजाल से।
    मुक्त हर दीवार रखना,
    मकड़ियों के जाल से।
    जड़ों को जकड़े न दीमक,
    रूप निज विकराल से,
    आस का नव सूर्य तुम हो,
    मैं हुआ बुझता दिया।

    बढ़िया नवगीत

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  2. बरस बीता कह गया ,, अच्छा गीत लिखा कल्पना जी आपने.
    आज तुम नवगीत हो,मैं
    गीत गुज़रा रह गया। ..... अच्छी पंक्तियाँ

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  3. वाह वाह बहुत सुन्दर ......सभी बंद अनोखे और सार्थक सन्देश के साथ

    लोग रोटी मांगते थे,
    चाँद लाकर दे दिया।
    बूंद रक्षण कर न पाया,
    अमिय घट, घटता गया,...इस सुन्दर नवगीत के लिए हार्दिक बधाई कल्पना जी

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  4. सुंदर नवगीत के लिए कल्पना जी को बधाई

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  5. बदल देना नियम सारे,
    खत्म सब मतभेद हो ।
    सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ ।

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  6. अनिल वर्मा, लखनऊ.13 दिसंबर 2012 को 6:56 pm

    बहुत ही सुन्दर रचना हार्दिक बधाई कल्पना जी. प्रत्येक पंक्ति लाजवाब.

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  7. अब तुम्हीं आज़ाद करना,
    देश को जंजाल से।
    मुक्त हर दीवार रखना,
    मकड़ियों के जाल से।
    जड़ों को जकड़े न दीमक,
    रूप निज विकराल से,
    आस का नव सूर्य तुम हो,
    मैं हुआ बुझता दिया।

    आमीन! काश यह मनोकामना पूर्ण हो सके.

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  8. कृष्ण नन्दन मौर्य20 दिसंबर 2012 को 7:04 am

    गगन बेशक छुआ लेकिन,
    देश अनदेखा किया।
    लोग रोटी मांगते थे,
    चाँद लाकर दे दिया

    सुन्दर नवगीत कल्पना जी

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