14 मार्च 2013

४. याद के पाहुन

मन को
फिर महका रहे हैं
याद के पाहुन

कल यहीं एक नीड़ पर था
पंछियो का चहचहाना
बौर वाला
आम पाता
मुस्कुराने का बहाना

आज
ब्रज भी भूल बैठा
बंसरी की धुन

ढोल ताशे चुप हुए अब
फाग राहें नापते हैं
रंग नकली
खूब बिकते
और टेसू ताकते हैं

हाथ
बाँधे तक रहा है
अनमना फागुन...

-सुवर्णा दीक्षित (छिंदवाड़ा)

16 टिप्‍पणियां:

  1. मन को
    फिर महका रहे हैं
    याद के पाहुन

    कल यहीं एक नीड़ पर था
    पंछियो का चहचहाना
    बौर वाला
    आम पाता
    मुस्कुराने का बहाना...बहुत सुन्दर नवगीत स्वर्णा जी

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    1. बहुत धन्यवाद सीमा जी , आभार

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  2. कल यहीँ एक नीड़ पर था
    पंछियोँ का चहचहाना
    बौर वाला
    आम पाता
    मुस्कुराने का बहाना

    बहुत सुन्दर भाव, मन को छूने वाला नवगीत। बधाई सुवर्णा जी।

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    1. जी, आभार आपका सुरेन्द्रपाल जी

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  3. सुचना ****सूचना **** सुचना

    सभी लेखक-लेखिकाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सुचना सदबुद्धी यज्ञ


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  4. सुंदर नवगीत के लिए सुवर्णा जी को हार्दिक बधाई

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    1. बहुत धन्यवाद कल्पना जी, सब आप लोगों के साथ के कारण हो पाता है, स्नेह बनाए रखियेगा. आभार

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  5. स्मृतियाँ महक उठी हैं कुछ जाने-पहचाने दृश्य झलकते ही, आम्रबौर के संग चिड़ियों की चहक चुपके-से उतर आती है मन में, गूंजने को होती ही है कोई धुन...कि बदला हुआ परिवेश चुभने वाली खामोशी और रूखेपन को समेट लाता है और धुंधला देता है रंगों को...अनमना फागुन असहाय ताकता-सा रह जाता है...
    फाग राहें नापते हैं
    रंग नकली
    खूब बिकते
    और टेसू ताकते हैं........रिश्तों-की नैसर्गिक सहजता को बनावटी हुड़दंग ने बेरंग कर दिया है, यही चिंता व्यक्त है यहाँ ! बहुत सुन्दर प्रस्तुति !

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  6. dhanyavaad ashwini ji evam padmnabh ji, protsahan hetu abhar

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  7. बहुत सुंदर नवगीत है सुवर्णा जी का, बहुत बहुत बधाई

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    1. बहुत आभार धर्मेन्द्र जी,

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  8. बहुत मनभावन नवगीत !

    डॉ सरस्वती माथुर

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    1. आभार सरस्वती माथुर जी,

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  9. अनिल वर्मा, लखनऊ.20 मार्च 2013 को 9:04 am

    ढोल ताशे चुप हुए अब
    फाग राहें नापते हैं
    रंग नकली
    खूब बिकते
    और टेसू ताकते हैं

    हाथ
    बाँधे तक रहा है
    अनमना फागुन...
    बहुत ही सार्थक रचना. बधाई सुवर्णा जी.

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    1. बहुत धन्यवाद प्रोत्साहन हेतु अनिल जी

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