15 मार्च 2013

५. कैसे कैसे रंग

फागुन की
झोली से निकले कैसे कैसे रंग
लो भइया!
फिर शुरू हो गयी होली की हुड़दंग

यूँ बौराया
आम कि सारा मौसम बौराया
कोयल ऐसे कूकी
सोया दर्द उभर आया
हवा चली मदभरी कि जैसे
पड़ी कुयें में भंग

जीजा–साली
देवर–भौजी जैसे रिश्ते हैं
हँसी–ठिठोली और
नेह की बाकी किश्तें हैं
बिसर गया है बाबा को भी
कुछ दिन से सत्संग

नशा चढ़ा है
ऐसा, किसको रस्ता सूझेगा
किस पर किसका
रंग चढ़ा है फागुन बूझेगा
कई नेह के अंकुर फूटे
लेकर नई उमंग

– रविशंकर "रवि"
राजापुर खरहर, रानीगंज
प्रतापगढ़, उ. प्र.

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुवर्णा शेखर15 मार्च 2013 को 7:28 pm

    बहुत सुन्दर नवगीत है रवि जी .......

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  2. परमेश्वर फूंकवाल16 मार्च 2013 को 6:38 am

    बहुत जीवंत गीत, होली को पूरी उमंग में जीता हुआ......

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  3. जोरदार मुखड़े के साथ सधे हुएअंदाज़ में सभी अंतरे बहुत सुंदर लगे। हार्दिक बधाई...

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  4. अच्छा नवगीत है रविशंकर जी, बधाई स्वीकार करें

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