16 मार्च 2013

६. रंगों का नव पर्व बसंती

रंगों का नव पर्व बसंती
सतरंगा आया
सद्भावों के जंगल गायब
पर्वत पछताया

आशा पंछी को खोजे से
ठौर नहीं मिलती.
महानगर में शिव-पूजन को
बौर नहीं मिलती
चकित अपर्णा देख, अपर्णा
है भू की काया

कागा-कोयल का अंतर अब
जाने कैसे कौन?
चित्र किताबों में देखें,
बोली अनुमानें मौन
भजन भुला कर डिस्को-गाना
मंदिर में गाया

है अबीर से उन्हें एलर्जी,
रंगों से है बैर
गले न लगते, हग करते हैं
मना जान की खैर
जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
'सलिल' मुस्कुराया

-संजीव सलिल

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सरस प्रस्तुतीकरण.

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  2. परमेश्वर फूंकवाल17 मार्च 2013 को 8:47 am

    आ सलिल जी आपने वर्तमान समय की सच्चाइयों का कितने सुन्दर शब्दों में वर्णन किया है. अपर्णा वाला अंतरा मुझे बहुत सुन्दर लगा.समय रहते हमें अपने अतीत को संभालना होगा यदि एक स्वर्णिम भविष्य की और बढ़ना है तो. सुन्दर सन्देश. बधाई !

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  3. है अबीर से उन्हें एलर्जी,
    रंगों से है बैर
    गले न लगते, हग करते हैं
    मना जान की खैर
    जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर
    'सलिल' मुस्कुराया
    बहुत सुंदर नवगीत है आपका,
    ....हार्दिक बधाई

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  4. आशा पंछी को खोजे से
    ठौर नहीं मिलती.
    महानगर में शिव-पूजन को
    बौर नहीं मिलती.........

    sundar navgeet salil jee

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  5. इस सुंदर नवगीत के लिए आचार्य जी को बहुत बहुत बधाई।

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  6. अनिल वर्मा, लखनऊ.20 मार्च 2013 को 9:00 am

    कागा-कोयल का अंतर अब
    जाने कैसे कौन?
    चित्र किताबों में देखें,
    बोली अनुमानें मौन
    बहुत खूब. सटीक एवं सार्थक नवगीत के लिये हार्दिक बधाई.

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  7. rajendra ji, parmeshvar ji, kalpana ji, suvarn aji, dharmendr ji anil ji aap sabki gun grahakta ko naman. utsahvardhan hetu abhar.

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