21 मार्च 2013

११. फगुआ – ढोल बजा दे

हर कडुवाहट पर
जीवन की
आज अबीर लगा दे
फगुआ – ढोल बजा दे

तेज हुआ रवि
भागी ठिठुरन
शीत – उष्ण – सी
ऋतु की चितवन
अकड़ गयी जो
टहनी मन की
उसको तनिक लचा दे

खोलें गाँठ
लगी जो छल की
रिहा करें हम
छवि निश्छल की
जलन मची अनबन की
उस पर
शीतल बैन लगा दे

साल नया है
पहला दिन है
मधुवन – गंध
अभी कमसिन है
सुनो, पपीहे
ऐसे में तू
कोयल के सुर गा दे

- अवनीश सिंह चौहान
(म्रारादाबाद)

4 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फूंकवाल22 मार्च 2013 को 8:22 am

    आ अवनीश जी का यह गीत होली की उमंग को तो जीता ही है पर बहुत व्यापक सन्देश भी देता है. यह गीत पहले पढ़ चूका हूँ ओर मुझे यह बहुत पसंद है. विशेषकर मन की टहनी वाला अंतरा. बधाई अवनीश जी को.

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  2. अनिल वर्मा, लखनऊ.22 मार्च 2013 को 10:21 am

    अकड़ गयी जो
    टहनी मन की
    उसको तनिक लचा दे
    बहुत बड़ी बात कह दी. सुन्दर नवगीत के लिये हार्दिक बधाई अवनीश जी.

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  3. खोलें गांठ
    लगी जो छल की
    रिहा करें
    छवि निश्छल की...
    बहुत सुन्दर नवगीत, बधाई अवनीश जी।

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