24 मार्च 2013

१३. फागुन

पुनः
समय की आँखों में है
महुआया फागुन

पोर-पोर सरसों पियराई
खुशबू की काया अंगड़ाई
सांझ – सकारे
सगुन पखेरू
बांच रहे निर्गुन

फिर फूले पलाश - वन दहके
बाध, बधारे, खेत, घर महके
बौरों का
पाहुर लेकर
आया मौसम पाहुन

है बरसात मदीर गंधों की
प्रेमगीत के स्वर-छंदों की
मन मे जमी
मेल धो देंगे
शब्दों के साबुन

नचिकेता

2 टिप्‍पणियां:

  1. फागुन का महुआना सचमुच विलक्षॆण है। सुन्दर गीत।
    नचिकेता जी हैं ही विलक्षण गीतकार।

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