22 मई 2013

३. जब गई थी गाँव से मैं


सौंप चंचल पंछियों सा एक बचपन नीम तुम को
खुशबुएँ निम्बोलियो की संग अपने ले गयी थी
जब गयी थी गाँव से मैं
दूर अपनी ठाँव से मैं

मौन थे हम
पर मुखर होता गया था विगत हर पल
कर गया था दृश्य हर ओझल चमकती आँख का जल
रिस रही थी नेह की हर बूँद मेरी अंजुरी से
धूप ओढ़े जा रही थी दूर
शीतल छाँव से मैं

झूलता था
बालपन मेरा तुम्हारी बाँह में जब
कल्पनाओं के परिंदे नाचते थे आँख में तब
चूम लेती थी निडर हो सूर्य को इक पींग में ही
खोलती थी रंग सारे इन्द्रधनुषी
पाँव से मैं

थे नहीं बस
वृक्ष तुम मेरे लिए तो पितृवत थे
मेरे तन मन की व्यथा की हर कथा की खैरियत थे
रौंद दी छाया घनेरी प्रगति रथ की तीव्रगति ने
हार बैठी एक अपना लालसा के
दाँव से मैं

-सीमा अग्रवाल
(कोरबा)

5 टिप्‍पणियां:

  1. सम्वेदना के रेशमी धागों से बुना एक बेहद खुबसूरत और आकर्षक नवगीत. अपने पीहर से विस्थापित होती लड़की का द्वार पर के नीम में अपने पिता ko देखने, उससे बिछड़ने, की कल्पना द्रावक है. खुबुस्रत नवगीत आपका सीमा जी. बधाई.

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  2. बहुत सुन्दर नवगीत। हार्दिक बधाई सीमा अग्रवाल जी।

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  3. अच्छा नवगीत है। बधाई हो सीमा जी को

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  4. बहुत सुन्दर गीत....
    बधाई.

    अनु

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  5. मौन थे हम
    पर मुखर होता गया था विगत हर पल
    कर गया था दृश्य हर ओझल चमकती आँख का जल...बहुत सुन्दर नवगीत

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