29 मई 2013

८. नीम हमारी बारहमासी थाती है

आम–आँवले तो
मौसम के साथी हैं
नीम हमारी बारहमासी थाती है

युगों–युगों से द्वार–
द्वार की शान बने हैं
सिर पर गहरी छाँव उठाये खड़े तने हैं
ठाँव जहाँ तपती दुपहरिया पाती है

पत्ते, फूल और फल
सब वरदान सरीखे
जड़ भी तो बहुमूल्य जड़ी–बूटी सी दीखे
दातूनों की दया दाँत चमकाती है

बाहर से भीतर से
संबल पाता जीवन
करे वायु के साथ रक्त का भी तो शोधन
पग–पग पर सेहत का साथ निभाती है

शाखों पर झूला डाले
जब सावन आये
पेंगो में उड़–उड़ जाये चुनरी लहराये
पुरवाई भी कजरी सुनने आती है

– रविशंकर मिश्र रवि
(प्रतापगढ़)

20 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छे नवगीत के लिए रविशंकर जी को बधाई

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  2. हमारे लोक जीवन की सखा-सहचरी नीम के बहुपयोगी रूप का दिकदर्शन कराता सुन्दर नवगीत। अन्य पेड़ों की अपेक्षा इसकी महत्ता सचमुच अतुल्य है, बड़ी संजीदगी से आपने इसे उजागर किया है। बधाई आपको रविशंकर जी।

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  3. आम–आँवले तो
    मौसम के साथी हैं
    नीम हमारी बारहमासी थाती है
    बहुत सुंदर और सशक्त नवगीत के लिए हार्दिक बधाई रविशंकर जी...

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    1. प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद कल्पना जी

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  4. सुन्दर गीत के लियर बधाई

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  5. नीम की शान में एक सार्थक रचना ! बहुत सुंदर !

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  6. नीम की शान में एक सार्थक रचना ! बहुत सुंदर !

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  7. आम–आँवले तो
    मौसम के साथी हैं
    नीम हमारी बारहमासी थाती है
    सुंदर अभिव्‍यक्ति। दशकुल वृक्षों की यही थाती है। नीम भी उनमें एक है। अच्‍छे नवगीत के लिए बधाई।

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  8. पग पग पर सेहत का साथ निभाती है
    बहुत सुन्दर नवगीत।

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  9. बहुत सुन्दर भावपूर्ण नवगीत के लिए बधाई।

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