24 जुलाई 2013

२. कभी न होना धूमिल चम्पा

जब जब
ताप बढ़ेगा चम्पा
पेड़ तुम्हारे छाँव करेंगे
रूप, सुगंध, गुणों की मलिका
तुम महकोगी
हम महकेंगे

नागफनी ने किया आक्रमण
जीवन के उद्यानों पर
हर आँगन में बसा लिए हैं
अपने साथी अपने घर

विचलित है
अंतर जन-जन का,
रंग तुम्हारे भाव भरेंगे।
तन कंचन, मन कोमल कलिका,
तुम किलकोगी,
हम किलकेंगे।

जहाँ नहीं शुभ कदम तुम्हारे,
हम बोएँगे बीज वहाँ।
अमलतास, कचनार, बाँस भी,
संग तुम्हारे होंगे हाँ।

जब रोगों
का हुआ आक्रमण,
प्राण-सुधा तुमसे हम लेंगे।
कभी न होना, धूमिल चम्पा,
तुम हर्षोगी
हम हर्षेंगे।

-कल्पना रामानी
मुंबई

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही मनभावन नवगीत ----चंपा के नाम,तुम किल्कोगी हम किल्केंगे ,वाह अद्भुत शब्द -विन्यास और कल्पनातीत सृजन !

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  2. वाह बहुत ही सुन्दर गीत .....सुन्दर प्रवाह में शब्दों का सुन्दर संयोजन ....हार्दिक बधाई आपको कल्पना दी

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  3. कितनी गहराई है ......कल्पनाजी की रचना में ....जितनी चंपा में खुशबू.....

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25/07/2013 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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  5. प्रकृति प्रेम, पर्यावरणीय सरोकार आपके नवगीतों में सदैव ही उभर कर आते हैं। लय का तो जवाब नहीं। अच्छे नवगीत के लिए बधाई आपको।

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  6. जहां नहीं शुभ कदम तुम्हारे,
    हम बोएँगे बीज वहां
    सुन्दर भावनाओं को महसूस करवाता नवगीत।
    हार्दिक बधाई।

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  7. बहुत सुंदर नवगीत रचा है कल्पना रामानी जी ने। उन्हें बहुत बहुत बधाई

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  8. कृष्ण नन्दन मौर्य13 अगस्त 2013 को 9:58 am

    जब जब
    ताप बढ़ेगा चम्पा
    पेड़ तुम्हारे छाँव करेंगे..... सुंदर नवगीत

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