25 जुलाई 2013

४. डाली चम्पा की

बीज बिना लग जाती है
डाली चम्पा की।

बिन जाने
पहचाने भा जाता है कोई
अपना सा लगने
लगता है कोई बटोही
खुशबू ने
कब दिया किसी को कोई बुलावा
किसे पता कब कर जायेगा कोई छलावा
शिखर चढ़ा जाती है पाती
अनुकम्पा की।

बौछारों से
हरियाली दिन दूनी बढ़ती
थोड़ी सी खुशहाली
अमरबेल सी चढ़ती
आशाओं के
नीड़ बसाते पंखी रोज
काक बया की करते हैं बदहाली रोज
काल कभी भी बन जाती है
वृष्टि शंपा की।

-आकुल
कोटा

13 टिप्‍पणियां:

  1. कब दिया किसी को कोई बुलावा
    किसे पता कब कर जायेगा कोई छलावा
    शिखर चढ़ा जाती है पाती
    अनुकम्पा की।..........बहुत सुन्दर गीत आकुल जी ,हार्दिक बधाई आपको

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  2. खूबसूरत भावपूर्ण नवगीत के लिए बधाई।

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    1. धन्‍यवाद सुरेन्‍द्रपालजी।

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  3. सुन्दर भाव लिए मधुर प्रस्तुति ...

    सादर
    ज्योत्स्ना शर्मा

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  4. अच्छा लगा आपका नवगीत आकुल जी।

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  5. कृष्ण नन्दन मौर्य13 अगस्त 2013 को 10:06 am

    बिन जाने
    पहचाने भा जाता है कोई
    अपना सा लगने
    लगता है कोई बटोही
    खुशबू ने
    कब दिया किसी को कोई बुलावा ....... बढ़िया गीत

    उत्तर देंहटाएं

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