27 जुलाई 2013

९. चम्पा का बूटा

चम्पा से
सट-सट के महका सा भीत
सीले से आँगन में बिखराया पीत

खेती पथारी
से सौ दुनियादारी से
बाबा के डेंगु तक बा की बीमारी से
माँ को भी बिसराया बचपन
का गीत

सावन यों
फूटा है, देवा ज्यों रूठा है
पानी में तिरता सा चम्पा का बूटा है
गाँठों का मारा है राहत
का फीत

निर्धन की
थाली पे गेंहू की बाली पे
फैली हथेली सम चम्पा सवाली पे
अगहन मेहरबाँ ना राजी
है सीत

-शार्दुला झा नोगजा
सिंगापुर

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर नवगीत है शार्दूला जी का, बधाई उन्हें

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  2. पाठशाला में आये कुछ उत्कृष्ट नवगीतों में से एक है आपका नवगीत। विम्ब, लय, शिल्प सभी कुछ मुझे बहुत भाया।

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  3. कृष्ण नन्दन मौर्य13 अगस्त 2013 को 10:19 am

    निर्धन की
    थाली पे गेंहू की बाली पे
    फैली हथेली सम चम्पा सवाली पे
    अगहन मेहरबाँ ना राजी
    है सीत ...... बहुत खूब

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