26 जुलाई 2013

७. चंपे की डाली

अधखिली कलियों का देख रूप आली
कौन सोच डूब गई चम्पे
की डाली

खिलने-
महकने में थोड़ी-सी देर है
बीते न रात, आह ! सुबह अबेर है
अलस नींद था सोया बगिया का माली
और सोच डूब गई चम्पे
की डाली ।

रूप दिया,
रंग दिया कितना उजास
पवन सखी फैलाए कन-कन सुवास
मधु से, मकरंद से क्यूँ रीती प्याली
यही सोच डूब गई चम्पे
की डाली

विधना ने
लिख दिया अपना विधान
संग ले उमंग जीत, जीने की ठान
मेरे साथ गा तू भी होकर मतवाली
अब कुछ ना सोच सखी चम्पे
की डाली

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

5 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे साथ गा तू भी होकर मतवाली
    अब कुछ न सोच सखी
    चम्पे की डाली।
    बहुत खूबसूरत नवगीत।

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  2. रूप दिया,
    रंग दिया कितना उजास
    पवन सखी फैलाए कन-कन सुवास
    मधु से, मकरंद से क्यूँ रीती प्याली
    यही सोच डूब गई चम्पे
    की डाली

    सुंदर कल्‍पना। सुंदर गीत। बधाई।

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  3. सुंदर नवगीत हेतु ज्योत्सना जी को बधाई

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  4. नवगीतकार का चम्पा से तादात्म्य और सम्वाद, सुन्दर नवगीत ज्योत्स्ना जी।

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  5. कृष्ण नन्दन मौर्य13 अगस्त 2013 को 10:04 am

    संग ले उमंग जीत, जीने की ठान
    मेरे साथ गा तू भी होकर मतवाली
    अब कुछ ना सोच सखी चम्पे
    की डाली ...............खूबसूरत नवगीत

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