12 दिसंबर 2013

२. आया है नव वर्ष

अब भूली बिसरी स्मृतियों के
उभरे हैं कोलाज
आया है नववर्ष हमारा
सिर पर बाँधे ताज

आशाओं के अंकुर फूटे
चहकी अँगनाई
धूप गुनगुनी घर-द्वारे
औ बालकनी आई
कड़क चाय
औ मटर की घुघरी
हो जाय अब आज

अभिलाषा की बेल हमारे,
छप्पर पे छाई
नई वधू सी आज चाँदनी
सहमी घर आई
नहीं उठाती सिर से अपने
घूँघट भीतर लाज

कठिन स्वप्न आँखों में जिनके
युवा-शक्ति की जय हो
एक हमारे सातों सुर
औ एक हमारी लय हो
अनुभव ने भी हाथ रख दिया
सिर पर अपना आज

संजू शब्दिता
(इलाहाबाद)

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर नवगीत के लिए आपको बहुत बहुत बधाई शब्दिता जी!

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  2. बहुत ही सुन्दर नवगीत! आदरणीया संजू बहन को बहुत बहुत बधाई!

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  3. आदरणीया कल्पना दीदी एवं आ ० बृजेश भाई आप सभी के कुशल मार्गदर्शन में ही यह नवगीत प्रस्तुत हो सका ,मैं ह्रदयतल से आभारी हूँ .आगे भी स्नेह बनाये रखेंगे ,ऐसी मुझे आशा है .

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  4. सुन्दर मुखड़ा, आधुनिकता और संस्कृति का सम्मिश्रण लिए एक सुन्दर गीत, बधाई संजू जी.

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  5. संजू शब्दिता जी को सुन्दर नवगीत के लिए बधाई।

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  6. सुन्दर नवगीत. बधाई शब्दिता जी

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  7. प्रस्तुत नवगीत रचनाकार की संभावनाओं को साझा करते हैं.
    इस बंद का होना आश्वस्त करता है -
    अभिलाषा की बेल हमारे,
    छप्पर पे छाई
    नई वधू सी आज चाँदनी
    सहमी घर आई
    नहीं उठाती सिर से अपने
    घूँघट भीतर लाज

    हार्दिक शुभकामनाएँ ..

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  8. सुन्दर नवगीत के लिए संजू शब्दिता जी को बधाई

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  9. सर्वप्रथम पाठशाला से जुड़ने के लिए आपको बधाई। भाव और शिल्प की दृष्टि से सुन्दर नवगीत बन pda है शब्दिता जी.

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  10. सर्वप्रथम पाठशाला से जुड़ने के लिए आपको बधाई। भाव और शिल्प की दृष्टि से सुन्दर नवगीत बन पीडीए है शब्दिता जी.

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