2 फ़रवरी 2014

२. देवता जागे

देवता जागे, सजे मंडप, बजीं
शहनाइयाँ।

झिलमिलाते वस्त्र, आभूषण
निकल बाज़ार से,
चल पड़े हैं तन सजाने वर-वधू
का प्यार से।
प्रेम का ले रंग उभरेगी
हथेली पर, हिना।
हँस रही हल्दी, शगुन पूरा
नहीं उसके बिना।
सात फेरे फिर रहे, लेते हुए
अँगड़ाइयाँ।

हो रहे दूल्हे विकल, सेहरे
सजाकर शीश पर,
दंग दर्पण तक रहा है दुल्हनों
को भर नज़र।
चल पड़े हैं बैंड-बाजे, संग
बाराती स्वजन।
भाँवरों के साथ होगा, वर-वधू
का चिर मिलन।
दूर होंगी दो दिलों को दूर
करती खाइयाँ।

स्नेह-मय सहभोज, न्यौते, भव्य
आयोजन सभी,
आदि से कायम प्रथाएँ हैं
हमारे देश की।
ये नहीं केवल दिखावा, गूढ़तम
संस्कार हैं,
गाँठ रिश्तों की न हो ढीली, यही
बस सार है।
निहित हैं इन रीतियों में भावमय
गहराइयाँ।

-कल्पना रामानी
मंबई

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा नवगीत है। परम्पराओं के मूल तक जाने कि सहज कोशिश अर्थ ,भाव और शब्दों कि लय से सम्पृक्त नवगीत में गहनता के साथ देखी जा सकती है। वाह।

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    1. आदरणीय, प्रोत्साहित करती हुई टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

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  2. बहुत सुन्दर नवगीत! शब्दों और भावों का जादूभरा संयोजन। शब्दचित्र दिल दिमाग पर छा गया।

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  3. एक श्रेष्ठ नवगीत -पहला पद विशिष्ट - इस गीत की उपलब्धि | मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारें, कल्पना जी!

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  4. आदरणीय रवीन्द्र जी, आपकी टिप्पणी से मनोबल में बहुत वृद्धि हुई है। आपका हार्दिक आभार।

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  5. अनिल वर्मा, लखनऊ3 फ़रवरी 2014 को 3:49 pm

    अप्रतिम रचना. बाज़ार-हाट, बाजे-गाजे, मधुर मिलन, हमारे संस्कारों की गहराई. विवाहोत्सव का कोना-कोना झांक आयी आपकी लेखनी. बधाई.

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  6. बहुत सुन्दर नवगीत, कल्पना रामानी जी हार्दिक बधाई
    rachana

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  7. अच्छे नवगीत हेतु बधाई स्वीकार करें कल्पना जी।

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  8. भाँवरों के साथ होगा, वर-वधू
    का चिर मिलन।
    दूर होंगी दो दिलों को दूर
    करती खाइयाँ।
    बहुत सुन्दर नवगीत कल्पना रामानी जी, हार्दिक बधाई

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  9. निहित हैं इन रीतियों में भावमय
    गहराइयाँ।

    इस पद ने तो जैसे इस संस्कार का सार ही साझा कर दिया. आपने आयोजन को चित्रवत उकेरा है आदरणीया ..
    बधाई व शुभकामनाएँ
    सादर

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  10. परम्पराओं को निभाने का आग्रह करता सुन्दर नवगीत...आपको बधाई कल्पना जी.

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  11. बहुत सुन्दर नवगीत कल्पना जी | पहला पद विशेष | बधाई |

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