17 अगस्त 2014

४. नव्य पथ नव दृष्टि - कृष्णनंदन मौर्य

नव्य पथ नव-दृष्टि कोई
चाहिए

स्वार्थ गढ़ते हैं कुटिल राजाज्ञायें
चलन में फिर हैं शकुनि की छल-कलायें
आचरण
उत्कृष्ट कोई
चाहिए

मोह के अंधे विरासत लिख रहे हैं
लाक्षागृह पर धुएं फिर दिख रहे हैं
इक विदुर सी
दृष्टि कोई
चाहिए

आ खड़े संबंध रण में सामने हैं
तीर अर्जुन के हुये फिर अनमने हैं
अब समय को
कृष्ण कोई
चाहिए

– कृष्ण नन्दन मौर्य

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