19 जनवरी 2010

१९- धुँधली धूप

घना घनेरा कोहरा छाया
धरती ढूँढ़न निकली-
धूप
अम्बर-
गलियाँ भूल भूलैयाँ
भूली भटकी फिरती धूप

हिम शिखरों पर शिशिर-हेमन्त
द्वार पाल से आन खड़े
सूरज ने साँकल खटकाई
सुनती घाटी
कान धरे
किरण डोर
से बँध कर आई
थकी-थकी अलसाई धूप

सिमटी सहमी धार नदी की,
शर सा चुभता शीत
थर-थर काँपें ताल तलैया
ठिठुरन से
भयभीत
गर्म दुशाला
ले कर आई
ओढ़ाती, सहलाती धूप

सी-सी सिहरें वन और उपवन
गाँव-गाँव अलाव जले
हीरक कणियाँ झूला बाँधें
हिम कण घुलते
पाँव तले
पीली मेंहदी
घोल के लाई
लीपे आँगन-देहरी धूप

धरती के
घर मिलने आई
धुँधले पथ पर चलती धूप

--शशि पाधा

11 टिप्‍पणियां:

  1. भूली भटकी फिरती धूप,
    द्वारपाल से शिशिर-हेमंत,
    सूरज का साँकल खटकाना,
    कान धरकर घाटी का सुनना,
    हीरक कणियों का झूला बाँधना,
    पीली मेंहदी से धूप का आँगन-देहरी लीपना!
    --
    इतने सुंदर बिंब देखकर,
    रवि-मन हुआ विभोर,
    भोर तक रहा सोचता -
    "कोहरा जाए, तो मैं आऊँ,
    या फिर मैं आऊँ, यह जाए!"

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  2. धरती के
    घर मिलने आई
    धुँधले पथ पर चलती धूप ।
    बहुत सुंदर रचना.
    धन्यवाद

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  3. अब तक
    रवि के मन
    भाती थी
    अब शशि के
    मन भायी धूप.
    रूप अनूप
    धूप का भाया,
    सुन्दर गीत
    मचलती धूप..
    *

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  4. आचार्य जी की ये पंक्तियाँ
    यह सिद्ध कर रही हैं कि "नवगीत की पाठशाला" के
    सभी नवगीतकार एक-दूसरे को
    अपने रंग में रँग रहे हैं!

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  5. akya sunder varnan hai
    man aanandit ho gaya
    badhai
    saader
    rachana

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  6. शशि जी क्या वर्णन किया है --
    द्वार पाल से आन खड़े
    सूरज ने साँकल खटकाई
    सुनती घाटी
    कान धरे
    किरण डोर
    से बँध कर आई
    थकी-थकी अलसाई धूप
    और
    हिम कण घुलते
    पाँव तले
    पीली मेंहदी
    घोल के लाई
    लीपे आँगन-देहरी धूप
    रचना पढ़ते -पढ़ते कल्पना में डुबकियाँ लगाने लगी,इतने सुन्दर चित्र उभरे कि अब उसे लिखने के लिए शब्दों की कंगाली महसूस कर रही हूँ ..
    बधाई ..बधाई..

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  7. 'धरती के
    घर मिलने आई
    धुँधले पथ पर चलती धूप'
    क्या कहने हैं!----------

    आंख मिचौली, लुका छुपी,
    लुक-छुप खेल खेलती धूप

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  8. आप सब की अमूल्य प्रतिक्रिया के लिये हार्दिक धन्यवाद।
    सादर,
    शशि पाधा

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  9. बहुत ही सुन्दर नवगीत शशि पाधा जी का। एक जगह थोड़ी सी लय में शिथिलता आ रही है ।
    हिम शिखरों पर शिशिर-हेमन्त
    द्वार पाल से आन खड़े
    के स्थान पर करें
    शिशिर और हेमन्त शिखर पर
    द्वार पाल से आन खड़े

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