6 अगस्त 2010

१५ : अमल होना था कमल : पं. गिरिमोहन गुरु

अमल होना था कमल
तव नाम

पंक से प्रकटित
मगर न मलिन मन
सुरभि से सम्पृक्त
कोमल मिला तन
प्रकृति का सबसे
बड़ा ईनाम

उपस्थिति से जगाया
लालित्य
धन्य है
पाकर तुझे
साहित्य
संस्कृति भी हो
रही अभिराम
--
पं. गिरिमोहन गुरु

5 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तम द्विवेदी7 अगस्त 2010 को 1:37 pm

    बोल व भाव सुन्दर है, नवगीत के अंतरों के छंद को बनाते समय मात्राओं का ध्यान रखें.थोड़े से अधिक प्रयत्न से अच्छा नवगीत रच सकते हैं.

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  2. सुन्दर नवगीत के लिए गिरिमोहन गुरु को हार्दिक वधाई।

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  3. प्रांजल भाषा, अभिनव कथ्य मन को छूने वाली रचना .

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  4. साहित्य व संस्कृति दोनो को एक साथ धन्य करनेवाले कमल की स्तुति में पं. गिरिमोहन गुरू की प्रस्तुति अत्यंत प्रशंसनीय है। साधुवाद!

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