21 दिसंबर 2010

९. एक साल गया, आया है नया

एक साल गया
आया है नया।
बच्चों को संग लिये
निकली है बया।
घोंसले से बाहर
कोहरे के पार पंख फैलाए
एक बड़ा, एक नीला आसमान है।

माना था गर्द
और बहुत दर्द।
पलकों पर आ जमा
मौसम भी सर्द।
एक घुप्प सफ़ेद अंधेरे
ठिठुरन के घेरे से बहुत ज़्यादा
दो हथेलियों की उष्मा में जान है।

बीता सो बुलबुला
शबनम में सब धुला।
एक हवा पत्तों को
आज भी रही झुला।
एक किरण पास आ
ज़ख्म सहलाती है हौले से गाती है
हौसले के पंखों में लंबी उड़ान है।

-अभिरंजन कुमार

7 टिप्‍पणियां:

  1. बीता जो बुलबुला,शबनम में सब धुला
    एक हवा पत्तों को , आज भी रही झुला।

    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति , बधाई।

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  2. बीता सो बुलबुला
    शबनम में सब धुला।
    एक हवा पत्तों को
    आज भी रही झुला।
    एक किरण पास आ
    ज़ख्म सहलाती है हौले से गाती है
    हौसले के पंखों में लंबी उड़ान है।
    sunder likha hai saral shbdon me bahut kuchh hai .
    aap ko badhai
    saader
    rachana

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  3. बीता सो बुलबुला
    शबनम में सब धुला।
    एक हवा पत्तों को
    आज भी रही झुला।

    सुंदर, मनोहारी प्रस्तुति अभिरंजन जी| बधाई|

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  4. सुंदर रचना...


    आभार और
    बधाई आपको....


    शुभ कामनाएँ...
    गीता पंडित

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  5. हार्दिक स्वागत अभिरंजन जी| बधाई|

    बीता सो बुलबुला
    शबनम में सब धुला।
    एक हवा पत्तों को
    आज भी रही झुला।
    एक किरण पास आ
    ज़ख्म सहलाती है हौले से गाती है
    हौसले के पंखों में लंबी उड़ान है।

    उत्तर देंहटाएं

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