25 अगस्त 2011

१२. महानगर में संध्या

महानगर के बाज़ारों में
गिरह काटती धूसर संध्या।

स्वेद-सिक्त धकियाते चेहरे
रुद्ध राह है, पग पथराए
रक्त-जात संबंधों को भी
रहे बाँट गूँगे चौराहे

यहाँ रोज़ ईमान ख़रीदे
बेच झील पेशेवर संध्या।

दिशा-हीन अंधी भीड़ों में
रहा खोज क्या निपट अकेला
लुटा राह में बनजारों-सा
गया छूट पीछे वह मेला

सूख गीत के अंकुर जाते
भूमि नागरी ऊसर वंध्या।

बनी बेड़ियाँ हैं अनदेखी
वर्ण-गंध की मधु छलनाएँ
लिए वंचना का बोझा हम
कहाँ-कहाँ की ठोकर खाएँ

विहग फाँस कर विश्वासों के
पंख कतरती निष्ठुर संध्या।

-राजेन्द्र गौतम
(दिल्ली)

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर नवगीत है ये राजेन्द्र गौतम जी का उन्हें बहुत बहुत बधाई इस नवगीत के लिए।

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  2. अच्छी रचना.. बधाई स्वीकारें

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  3. भाई राजेन्द्र गौतम के इस गीत में महानगर की धूसरित सांझ की विभिन्न आकृतियाँ जीवंत होकर उपस्थित हुई हैं| पहले दो पद तो अद्भुत बन पड़े हैं| गौतमजी को मेरा हार्दिक साधुवाद इतने सशक्त नवगीत के हेतु| पाठशाला के नवांकुरों के लिए यह रचना अपने-आप में एक पूरी पाठशाला है|

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  4. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

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  5. विहग फाँस कर विश्वासों के
    पंख कतरती निष्ठुर संध्या।


    वाह..
    बहुत सुंदर नवगीत..


    बधाई आपको
    और आभार...

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  6. दिशा-हीन अंधी भीड़ों में
    रहा खोज क्या निपट अकेला
    लुटा राह में बनजारों-सा
    गया छूट पीछे वह मेला
    बहुत सुंदर नवगीत बधाई आपको
    और आभार...

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